शनिवार - 25 जुलाई
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चीन के तट पर जापान के आक्रमण
25 जुलाई सन 1894 ईसवी को चीन के तट पर जापान के आक्रमण के साथ ही दोनों देशों के बीच युद्ध आरंभ हुआ।
1547, फ्रांस के हेनरी द्वितीय को ताज पहनाया गया।
1689, फ्रांस ने इंग्लैंड पर आक्रमण की घोषणा की।
1813, भारत में पहली बार नौका दौड़ प्रतियोगिता कोलकाता में आयोजित हुई।
1814, नियाग्रा फॉल्स के युद्ध में अमरीका ने ब्रिटेन को हरा दिया।
1963, अमरीका, रूस और ब्रिटेन ने परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए।
1978, दुनिया के पहली आइवीएफ़ शिशु लुइस ब्राउन का जन्म आज ही के दिन 1978 में इंग्लैंड के ओल्डहैम शहर में हुआ था।
2007, भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभा पाटिल ने शपथ ली।
आधुनिक हथियारों से लैस होने के कारण जापान की सेना को इस युद्ध में सफलता मिली। युद्ध के समापन पर दोनों पक्षों ने शेमूनोस्की समझौते पर हस्ताक्षर किये। जिसके आधार पर चीन अपने कई द्वीप जापान को देने पर विवश हुआ। इसी युद्ध से जापान और रुस के बीच लड़ाई की भूमिका प्रशस्त हुई। क्योंकि इस युद्ध के दौरान जापान ने रुस के भी कुछ सैनिक ठिकानों को निशाना बानाया था।
25 जुलाई सन 1938 ईसवी को फ़िलिस्तीन की एक मंडी में दो बम विस्फोटों में 62 असैनिक मारे गये और लगभग 100 अन्य घायल हो गये। यह धमाके आतंकवादी जायोनी गुटों ने किये थे। उनका उददेश्य फ़िलिस्तीनियों में भय उत्पन्न करके उन्हें पलायन पर विवश करना था। शहरों और गावों में असैनिकों पर आक्रमण करके भय फैलाने की ज़ायोनी शासन की प्रक्रिया आज भी जारी है।

25 जुलाई सन 1993 ईसवी को जायोनी शासन के सैनिकों ने दोबारा दक्षिणी लेबनान पर जल थल और वायु आक्रमण किया। लेबनान पर 1982 में आक्रमण के बाद यह ज़ायोनी शासन का सबसे भयंकर हमला था। इस में 128 असैनिक शहीद 500 घायल और चार लाख लोग बेघर हुए। इसके अतिरिक्त दक्षिणी लेबनान के क्षेत्र को भारी आर्थिक हानि पहुँची। इस आक्रमण के बावजूद लेबनानी जवानों ने ज़ायोनी शासन का मुक़ाबला जारी रखा यहॉ तक कि मई सन 2000 में ज़ायोनी सेना को दक्षिणी लेबनान से मार भगाया।

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4 मुर्दाद सन 1323 हिजरी शम्सी को ईरान में पहलवी शासन श्रृंखला के संस्थापक रज़ा पहलवी का 16 वर्ष के शासन और तीन वर्ष के निर्वासन के बाद दक्षिणी अफ़्रीक़ा में निधन हो गया। उसका जन्म 1257 हिजरी शम्सी में उत्तरी ईरान के एक गाव में हुआ था। 1299 में जब वो सेना में था तो उसने ब्रिटेन के इशारे पर सैनिक विद्रोह किया जिसके बाद उसे ईरान का रक्षा मंत्री और फिर प्रधान मंत्री बनाया गया। ब्रिटेन की सहायता से उसने 1304 हिजरी शम्सी में क़ाजार शासन श्रृंखला का पतन कर दिया। और जनता के व्यापक विरोध के बावजूद सत्तासीन हो गया। ईरान में उसने 16 वर्षों तक अत्याचारपूर्ण शासन किया। इस बीच उसने देश में इस्लामी संस्कृति के स्थान पर पश्चिमी संस्कृति के प्रचलन का प्रयास किया। जिसपर ईरान की मुसलमान जनता ने कड़ा विरोध जताया। द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने के बाद जब रज़ाख़ान ने जर्मनी के तानाशाह हिटलर का साथ देने का संकेत दिया तो संयुक्त सेना ने ईरान पर अधिकार करके 1320 में उसे गिरफ़तार किया और देशनिकाला देकर मोरीशस भेज दिया।