Feb १९, २०१६ ०८:४७ Asia/Kolkata
  • निकोलस कॉपरनिकस
    निकोलस कॉपरनिकस

19 फ़रवरी सन 1473 ईसवी को हॉलैंड के गणितज्ञ और खगोल शास्त्री निकोलस कॉपरनिकस का जन्म हुआ।

उन्होंने पहले खगोलशास्त्र फिर चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद वे रोम में गणित पढ़ाने लगे किंतु साथ ही साथ उन्होंने खगोल शास्त्र का अध्ययन भी जारी रखा। अपने कठिन परिश्रम के परिणाम स्वरूप उन्होंने 1503 ईसवी में यह पता लगाया कि पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर चक्कर काटती और 24 घंटों में एक बार स्वयं अपना चक्कर पूरा करती है। खगोल शास्त्र के विषय में अपनी पुस्तक के प्रकाशित होने से कुछ ही दिन पहले 24 मई सन 1543 ईसवी को कॉपरनिकस का निधन हो गया।

 

19 फ़रवरी सन 1951 ईसवी को फ़्रांस के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक आंद्रे जाइड का 82 वर्ष की आयु में निधन हुआ। वे सन 1869 ईसवी में पेरिस में जन्मे थे किंतु उन्होंने अपनी आयु का अधिकांश भाग उत्तरी अफ़्रीक़ा विशेषकर अलजीरिया में बिताया और अपनी बहुत सी विश्व विख्यात कहानियां इसी क्षेत्र के लोगों के जीवन को देखकर लिखीं। ग्रामीण तराना, आंद्रे की एक अत्यंत मनमोहक रचना है। इसी प्रकार ज़मीनी दस्तरख़ान और पतझड़ के पत्ते भी उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में है। जाइड को 1947 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 

19 फ़रवरी सन 1997 ईसवी को चीन के वरिष्ठ नेता और इस देश में आर्थिक सुधार की नींव डालने वाले डेंग ज़ियाउ पेंग का 92 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उन्होंने अपनी आयु के 75 वर्ष चीन की सरकार में विभिन्न पदों पर आसीन रहकर राजनैतिक गतिविधियों में बिताए पेंग के काल में चीन में आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में भारी परिवर्तन हुए। उन्होंने इस देश की बंद आर्थिक व्यवस्था को भारी आर्थिक परिवर्तन करके बाज़ार की अर्थ व्यवस्था की दिशा दिखाई। इन वर्षों में चीन ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अतीत से अच्छे अंदाज़ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और विभिन्न देशों से उसके संबंध अच्छे हुए क्योंकि उसने पारस्परिक संबंधों में तनाव दूर करने को अपनी विदेश नीति में प्राथमिकता दी। वर्ष 1990 में पेंग ने बुढ़ापे और बीमारी के कारण समस्त सरकारी पदों से त्यागपत्र दे दिया ताकि मानसिक रुप से उन्हें विश्राम का अवसर मिल सके। त्यागपत्र के बाद भी पेंग को चीन में राष्ट्रीय स्तर पर विशेष स्थान प्राप्त रहा। बड़े परिवर्तनों की सूचना उन्हें अवश्य दी जाती और बहुत से मामलों में उनसे सलाह भी ली जाती थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि त्यागपत्र के बाद भी मरने तक पेंग चीन के प्रतिष्ठित लोगों में रहे।

19 फ़रवरी वर्ष 1986 को उर्दू के प्रख्यात साहित्यकार, इतिहासकार और अध्ययनकर्ता मौलाना एजाज़ुल हक़ क़ुद्दूसी का निधन हुआ। वे जुलाई 1905 में जालंधर में जन्मे थे। उनका संबंध सूफ़ी श्रंखला चिश्तिया के प्रख्यात सूफ़ी अब्दुल क़ुद्दूस गंगोही के परिवार से था और इसी कारण वे क़ुद्दूसी कहलाते थे। शेर-शायरी, धर्म और सूफ़ी मत से लगाव के कारण उन्होंने लिखने-लिखाने का काम आरंभ किया और बच्चों के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके साथियों के चरित्र के संबंध में कई पुस्तकें लिखीं। वर्ष 1951 में वे पाकिस्तान चले गए जहां उन्हें बहुत अधिक कठिनाइयां सहन करनी पड़ीं किंतु उन्होंने लेखन जारी रखा। मौलाना एजाज़ुल हक़ क़ुद्दूसी ने इतिहास के क्षेत्र में कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें तीन खंडों में सिंध का इतिहास तथा सिंध की ऐतिहासिक कहानियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने तुज़्के जहांगीरी का उर्दू में अनुवाद भी किया है।

 

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30 बहमन सन 1388 हिजरी शम्सी को ईरान में स्थानीय रूप से निर्मित विध्वंसक पोत जमारान ने अपना पहला अभियान आरंभ किया। यह युद्धपोत हेलीकाप्टर और तारपीडो से लैस और समुद्र तल, हवा तथा जल के भीतर अपने लक्ष्य को ध्वस्त कर देने में सक्षम है। स्थानीय रूप से निर्मित इस युद्धपोत की लंबाई 94 मीटर है और इस पर 1420 टन भार लादा जा सकता है और 54 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार से चल सकता है। इसी प्रकार यह युद्धपोत 140 दलकर्मियों और हेलीकाप्टर को भी उठाने में सक्षम है। इस युद्धपोत के कुछ मुख्य उपकरण कुछ विशेष देशों के पास ही हैं किन्तु ईरानी विशेषज्ञों ने इस अंतर्राष्ट्रीय एकाधिकार को तोड़ दिया और इसके निर्माण और अन्य कई उपलब्धियों में ईरान को आत्मनिर्भर बना दिया।

 

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24 जमादिस्सानी सन 544 हिजरी क़मरी को मुसलमान धर्मगुरू अहमद बिन अली बैहक़ी सब्ज़वारी का निधन हुआ।

वे अरबी भाषा में दक्ष थे। साथ ही वे क़ुरआन मजीद की आयतों की समीक्षा भी बड़ी कुशलता से करते थे। उनकी अधिकांश पुस्तकें क़ुरआन के बारे में हैं।

 

24 जमादिस्सानी सन 616 हिजरी क़मरी को अरबी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार यहया बिन क़ासिम सालेबी का निधन हुआ वे अबू ज़करिया के नाम से प्रसिद्ध हुए। साहित्य के अतिरिक्त वे धार्मिक ज्ञान में भी दक्ष थे। उन्होंने वर्षो तक बग़दाद में शिक्षा दी। उनका पद्य संकलन अरब बुद्धिजीवियों के मध्य विशेष ख्याति रखता है।