Jan १९, २०१६ ०९:०० Asia/Kolkata

मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी ईरान के वह महान बुद्धिजीवी एवं शायर हैं जो विश्व प्रसिद्ध हैं।

मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी ईरान के वह महान बुद्धिजीवी एवं शायर हैं जो विश्व प्रसिद्ध हैं। उनके मूल्यवान विचारों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और बहुत से साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने उनसे बहुत लाभ उठाया है। मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी सातवीं हिजरी शताब्दी अर्थात १३वीं शताब्दी ईसवी के प्रसिद्ध शायर एवं परिज्ञानी हैं।

                     

 

रविवार के दिन पांच जमादीस्सानी ६७२ हिजरी क़मरी अर्थात १७ दिसंबर १२७३ ईसवी को मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी का निधन हो गया परंतु उनकी ख्याति उनके निधन के बाद भी बाक़ी रही और शताब्दियों का समय बीत जाने के बाद भी वह समाप्त नहीं हुई है। क्योंकि उनके जो शेर व रचनाएं हैं वर्षों का समय बीत जाने के बावजूद अभी भी समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य ऐसे लोग पाये जाते हैं जो उन्हें बहुत पसंद करते हैं और वे अपने पढने वालों में रुचि उत्पन्न कर देते हैं जिसकी वजह से संबोधक मौलवी की रचनाओं के प्रेमी बन जाते हैं।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इन रचनाओं को पसंद करने वाले केवल ईरानी नहीं बल्कि विदेशी भी हैं क्योंकि मौलवी की रचनाओं और शेरों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और विभिन्न देशों के बहुत से अध्ययन व शोधकर्ताओं ने उनके जीवन, उनकी सोच और उनकी आस्था के बारे में किताबें और लेख लिखे हैं। जर्मनी की एक अध्ययनकर्ता व विचारक श्रीमती एना मौरी हैं जिन्होंने मौलाना जलालुद्दीन बल्ख़ी के बारे में किताब और कई लेख लिखे हैं और इस बारे में उनका मानना है कि “ग़ज़लियाते दीवाने कबीर” नामक पुस्तक का पूरा और “मसनवी मानवी” तथा “फिही मा फिही” का अब तक चुने हुए अंशों व भागों का अलग २ तरीक़ों से कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और उसने दुनिया के बहुत से साहित्यकारों एवं विचारकों पर गहरा प्रभाव डाला है और बहुतों ने मौलवी के विचारों के बारे में अध्ययन व शोध किया है।

 

 

पाकिस्तानी अध्ययन व शोधकर्ता मोहम्मद नज़ीर ने भी अब तक मौलवी की मसनवी के बारे में १९५ किताबों और व्याख्याओं की फारसी, अरबी, तुर्की, पश्तू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और स्वीडीश सहित विभिन्न भाषाओं में पहचान की है। इस समय मौलवी की रचनाओं के बारे में जो किताबें, लेख प्रकाशित हुई हैं उन्हें न केवल ईरान बल्कि पूरे विश्व में देखा जा सकता है। उदाहरण स्वरूप पिछले वर्षों में अमेरिका में संगीत की एक सीडी बनी थी जिसे मौलवी की अनुवादित ग़ज़लों के आधार पर बनाया गया था और वह बहुत अधिक बिकने वाली सीडियों में से एक थी। शताब्दियों का समय बीत जाने के बाद यह सब मौलवी की सोच के ताज़ा होने का सूचक है।

गद्य और पद्य में जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी की कई रचनाएं हैं। “मकातिब” “फिही मा फिही” गद्य में और दीवाने कबीर और मसनवी माअनवी पद्य में है। “मकातिब” के अलावा जो रचनाएं हैं उनमें कुछ पत्र हैं जिन्हें मौलवी ने अपने समय के गणमान्य व्यक्तियों को लिखा था और अधिकांश अध्ययनकर्ताओं एवं शोधकर्ताओं का मानना है कि उन्हें स्वयं मौलवी ने न तो लिखा है न ही उन्हें जमा किया है बल्कि उनके शेरों को उनके एक वफादार शिष्य हेसामुद्दीन चलबी ने लिखा है और वह मौलवी को सुनाता था और मौलवी उसमें सुधार करते थे। “फिही मा फिही” और मजालिसे सब्आ को भी उनके शिष्यों ने लिखा और उसे जमा किया है। “फिही मा फिही” वह किताब है जिसमें ग़ैर आधिकारिक बैठकों में मौलवी की बातों को लिखा गया है। उन बैठकों में की जाने वाली बातों को लिखा गया है जिनमें मौलवी के शिष्य या नगर के प्रतिष्ठित व गणमान्य लोग प्रश्न करते और मौलवी उनके उत्तर देते थे। मौलवी की रचनाओं के अध्ययन व शोधकर्ताओं के विचार में “फिही मा फिही का महत्व हर चीज़ से अधिक इस कारण है कि मसनवी और दीवाने शम्स में मौलवी ने जो संकेत किये हैं यह किताब उन्हें समझने की वास्तविक कुंजी है। क्योंकि शेर कहने में मौलवी लय और तुक जैसे सिद्धांतों के प्रति कटिबद्ध रहते थे जिसके कारण वह आसानी से बात नहीं कर सके हैं परंतु “फिही मा फिही” किताब में उन्होंने आसानी से अपने विस्तृत विचारों व सोचों को बयान किया है।

 

 

मौलवी की एक किताब “मजालिसे सब्आ” है। इस किताब में उस सात बैठकों का वर्णन है जिन वर्षों में वह मिम्बर पर जाते थे। शम्स से मुलाक़ात होने और अपने आंतरिक परिवर्तन के बाद मौलवी एक बार से अधिक मिम्बर पर नहीं गये इस बात के दृष्टिगत यह किताब यानी मजालिसे सब्आ शम्स से मुलाक़ात से पहले मौलवी के व्यक्तित्व और उनके विचारों से अवगत होने के लिए अध्ययनकर्ताओं की सहायक सिद्ध हो सकती है। मसनवी माअनवी और दीवाने कबीर दीवाने शम्स के नाम से भी प्रसिद्ध हैं और इसमें ग़ज़लें एवं चौपाइयां हैं। दो महत्वपूर्ण रचनायें हैं जिन्हें मौलवी ने शेर में कहा है। इन दोनों रचनाओं में मौलवी के विचार हैं जिनकी अपने स्थान पर हम विस्तार से समीक्षा करेंगे।

मौलवी के विचारों के बारे में उस्ताद अब्दुल हुसैन ज़र्रीनकूब कहते हैं” मौलवी न दर्शनशास्त्री हैं न शायर परंतु इन सबके साथ शेरों के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें दर्शनशास्त्री और शायर दोनों बना दिया है। वह शेर कहते हैं और उसमें वह न केवल अपने आध्यात्मिक आभास को बयान करते हैं बल्कि अपने दर्शनशास्त्री विचार भी प्रकट करते हैं। मौलवी/ विचारकों, तर्कशास्त्रियों और उनके विचारों को पसंद नहीं करते थे परंतु अपने विचारों के बयान करने और किसी बात को सिद्ध करने के लिए वह उनकी तरह तर्क पेश करते थे।“

 

 

मौलवी ने अपने शेरों में ब्रह्मांड, ईश्वर, आत्मा, प्रलय, इंसान, भौतिक दुनिया में उसकी कठिनाइयों, ईश्वर के मार्ग में उसकी विपत्तियां और सत्य तक पहुंचने के बारे में बात की है। कुछ अध्ययनकर्ताओं के अनुसार मौलवी की रचनाएं इंसान के आध्यात्मिक विकास के बारे में बात करती हैं और इस बात की सीमा को रेखांकित करती हैं कि कौन सा कार्य इंसान अपने इरादे व नियंत्रण से अंजाम देता है और किन कार्यों में वह मजबूर है और उसका कोई नियंत्रण नहीं है और उस चीज़ का चित्रण करता है कि इंसान किस प्रकार स्वयं को ईश्वर के मार्ग में मिटा देता है। मौलवी इन बिन्दुओं को बयान करने में विश्व को कभी एक दर्शनशास्त्री की दृष्टि से तो कभी एक शायर व परिज्ञानी की दृष्टि से देखते हैं परंतु वह हर स्थिति और हर दृष्टि में सफल रहे हैं।

मौलवी के शेरों में प्रकृति और समाज को विशेष दृष्टि से देखा गया है। मौलवी विशेषज्ञ गोल्पीनार ली का उनके शेरों के बारे में मानना है कि मौलवी ऐसे शायर थे जो कभी भी लोगों से अलग नहीं होते थे यानी जनप्रिय शायर थे और वह जो समस्त बातें कहते थे उन सबका आधार आम लोगों की भाषा होती थी इस कारण उनके बयानों में जीवनदायक शक्ति नीहित है। ज़मीन, खेत, मिट्टी और पानी यानी ऐसी महत्वपूर्ण चीज़ें हैं जिनसे हम अलग नहीं हो सकते और ये चीज़ें उनके शेरों के मूल तत्व हैं।“ यानी सिद्धांतिक रूप से उनके शेर इन्हीं चीज़ों के बारे में हैं। मौलवी प्रकृति को महान ईश्वर का प्रतिबिम्बन समझते हैं और कभी समूचे ब्रह्मांड में महान ईश्वर के अतिरिक्त कुछ देखते ही नहीं और यह उनके महान ईश्वर की याद में डूब जाने की परिचायक है। जो कुछ मौलवी अपने शेरों में बयान करते हैं वह समूचे ब्रह्मांड के साथ इंसान के संबंध को बयान करता है और उसमें परिज्ञानी, महान ईश्वर के अतिरिक्त किसी और चीज़ को देखता ही नहीं।

 

 

 मौलवी इंसान की नियत की विशुद्धता को ज्ञान एवं अमल में आवश्यक मानते हैं और वे सिफारिश करते हैं कि इंसान को चाहिये कि वह अपने कार्यों में ईश्वर के अतिरिक्त किसी और चीज़ को दृष्टि में न रखे और वह बल देकर कहते हैं कि जब तक इंसान की दृष्टि ग़लत इच्छाओं से पवित्र नहीं होगी तब तक इंसान उस वास्तविकता तक नहीं पहुंच सकता जो सच्चाई का स्रोत है।