मीर सैयद अली हमदानी
मीर सैयद अली हमदानी चौदहवीं शताब्दी ईसवी के महान ज्ञानी थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन कश्मीर और ताजेकिस्तान में इस्लाम धर्म तथा नैतिक शिक्षाओं के प्रचार में व्यतीत कर दिया।
उनका संबंध किबरवीया सूफ़ी मत से था। विद्वान गलियारों में उन्हें सुलतानुल आरेफ़ीन की उपाधि से ख्याति प्राप्त है। कश्मीर के लोग उन्हें इस्लाम का आधार, द्वितीय अली और उनके श्रद्धालु उन्हें शाहे हमदान कहते हैं। उन्हें अमीर कबीर के नाम से भी जाना जाता है। ताजेकिस्तान में वह हज़रत अमीर जान के नाम से विख्यात हैं।
हमने इससे पहले भी बताया कि विख्यात ईरानी विद्वान मीर सैयद अली हमदानी का जन्म सन 714 हिजरी क़मरी में हमदान में हुआ। उन्होंने शिक्षा प्राप्ति के बाद महान ज्ञानियों की सेवा में रहना शुरू कर दिया और पवित्र जीवन बिताने का अभ्यास करते रहे। उन्होंने सभी इस्लामी ज्ञान प्राप्त किए। महान ज्ञानियों की पवित्रता का उन पर बहुत गहरा असर हुआ। जब वह एक महान धर्मगुरू और अत्यंत्र पवित्र ज्ञानी बन गए तो उनके गुरुओं ने उन्हें इस्लाम धर्म की शिक्षाओं से लोगों के अवगत कराने की ज़िम्मेदारी सौंपी और वह ईरान से रवाना हो गए। मीर सैयद अली हमदानी ने अपनी आयु के अंतिम क्षण तक इस दायित्व पर अमल किया और अपना पूरा जीवन इसलाम के प्रचार प्रसार तथा शिक्षार्थियों के प्रशिक्षण में बिताया।
हमने यह भी बताया कि मीर सैयद अली हमदानी अपने जीवन में तीन बार कश्मीर गए। इतिहासकारों का कहना है कि इस यात्रा में ईरान, इराक़, काबुल, क़ंधार और बुख़ारा के बहुत से महान ज्ञानी, कलाकार और व्यापारी मीर सैयद अली हमदानी के साथ थे। इनमें से बहुत से लोग कश्मीर में ही बस गए और आज भी उनके वंशज कशमीर तथा भारत के अन्य भागों में मौजूद हैं।
इतिहासकारों का कहना है कि मीर सैयद अली हमदानी के साथ इस यात्रा पर जाने वाले कलाकार, और व्यापारी अपने साथ कला लेकर कश्मीर गए और उसे वहां प्रचलित किया तथा मीर सैयद अली हमदानी की शिक्षाओं के कारण कश्मीर में इन कलाओं के साथ ही साथ ही हलाल रोज़ी कमाने की शिक्षा भी आम हुई। मीर सैयद अली हमदानी की मृत्यु के बाद उनके बेटे सैयद मोहम्मद हमदानी ने अपने पिता का मिशन जारी रखा तथा कश्मीर यात्रा में अपने साथ दूसरे बहुत से ज्ञानियों, धर्मगुरुओं, कलाकारों और सौदागरों को ले गए।
दस्तावेज़ों से पता चलता है कि मीर सैयद अली हमदानी के साथ कश्मीर जाने वालों की संख्या 700 थी। इतिहासकार मानते हैं कि इसी यात्रा के चलते ईरानी कलाओं का कश्मीर में चलन हुआ। इस तरह मीर सैयद अली हमदानी ने अपने पैरों पर खड़े और हलाल रोज़ी कमाने वाले समाज के गठन की नज़रिए को अमली रूप दिया। सूत्र कहते हैं कि कश्मीर में शाल की बुनाई की कला पतन की ओर बढ़ रही थी कि इसी बीच मीर सैयद अली हमदानी कश्मीर पहुंचे। उनके विचारों तथा सुलतान क़ुतबुद्दीन की ओर से मीर सैयद अली हमदानी के भरपूर समर्थन के नतीजे में कश्मीर में बुनाई का काम एक बार फिर प्रचलित हो गया जिससे कश्मीर के लोगों की ज़रूरतें भी पूरी होने लगी और वहां के लोगों ने अन्य क्षेत्रों के लिए निर्यात भी शुरू कर दिया। मीर सैयद अली हमदानी भी अपने जीवन का ख़र्च टोपियां बुनकर निकालते थे। इस तरह उन्होंने आम लोगों के साथ ही ज्ञानियों और सभ वर्गों को यह संदेश भी दिया कि अपनी आजीविका कमाने के लिए मेहनत करते रहना चाहिए। मीर सैयद अली हमदानी के निधन के बाद भी टोपी की बुनाई की कला हस्तकला के रूप में जारी रही और आज भी यह कला कश्मीर में मौजूद है तथा कश्मीर के लोग इस कला से भी अपनी आजीविका कमाते हैं।
मीर सैयद अली हमदानी ने कश्मीर में अपनी शिक्षाओं और प्रशिक्षक उपायों से इस क्षेत्र को लघु ईरान बना दिया। मीर सैयद अली हमदानी की सतत सेवा और प्रयास के नतीजे में शाल की बुनाई आज भी कश्मीर में प्रचलित है। मीर सैयद अली हमदानी ने शाल की बुनाई और टोपी की बुनाई ही नहीं बल्कि दूसरी ईरानी हस्तकलाओं को भी कश्मीर में फैलाया। अतः आज लगभग सभी शोधकर्ताओं जैसे प्रोफ़ेसर शम्सुद्दीन अहमद, निशात अंसारी, फ़ारूग़ बुख़ारी, डाक्टर इक़बाल और मुहिब्बुल हसन यही मानते हैं कि कश्मीर में हस्तकला के जन्म और प्रचलन का श्रेय मीर सैयद अली हमदानी को जाता है। फ्रांसीसी लेखक हेनरी कार्बन का भी यही मानना है कि मीर सैयद अली हमदानी के माध्यम से कश्मीर में बहुत सी ईरानी कलाएं प्रचलित हुईं।
मीर सैयद अली हमदानी ने ईरान से आधुनिक ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों को कश्मीर ले जाने के साथ ही इस क्षैत्र में ईरानी कलाओं और उद्योगों के विकास के लिए बिल्कुल अलग वातावरण उत्पन्न किया इससे स्थानीय उद्योगों और कलाओं को भी विकास का अच्छ अवसर मिला। इस क्षेत्र के उद्योग और कलाओं से भारत के अन्य क्षेत्रों को भी लाभ पहुंचा और उनकी भी आर्थिक मदद हुई। रेशमी और ऊनी कपड़ों और क़ालीनों की अलग अलग डिज़ाइनों और रंगों के साथ बुनाई इसी प्रकार लकड़ी और काग़ज़ को रंगने का काम तथा लकड़ी पर डिज़ाइनें बनाने की कला का भी चलन बढ़ा।
यह कलाएं शताब्दियों तक कश्मीर में प्रचलित रहीं और आज भी इनका चलना है। इन कलाओं और उद्योगों की बारीकियों पर ध्यान दिया जाए तो ईरान और भारत विशेष रूप से कश्मीर के बीच निकट संबंधों को समझा जा सकता है। ईरानी संस्कृति इन कलाओं और उद्योगों के साथ कश्मीर पहुंची यही कारण है कि कश्मीर में आज ही बहुत से पेशे हैं एसे हैं जिनके नाम ईरानी हैं जैसे कबाब पज़ी, ज़रगरी, काग़ज़ साज़ी, नमद साज़ी, ज़रदोज़ी, कूज़ागरी, इसी तरह दूसरे बहुत से नाम हैं। कश्मीर के शासकों ने इन कलाओं और उद्योगों का स्वागत किया तथा इसे अपनी धरती के कोने कोने तक पहुंचाया। उदाहरण स्वरूप सुलतान ज़ैनुल आबेदीन ने अपने शासन काल में समरक़ंद से जो उस ज़माने में ईरान का भाग था कलाकारों को श्रीनगर बुलवाया। यह कलाकार जिल्दसाज़ी, काग़ज़साज़ी, क़लमदान साज़ी, और क़ालीने बुनने में दक्षता रखते थे। इस शासक ने कुछ कश्मीरियों को ईरान भेजा ताकि वह इन कलाओं को भलीभांति सीखें और अपने वतन लौटकर उसका प्रसार करें। इस प्रकार ईरानी और कश्मीरी कलाओं और उद्योगों का संगम हुआ तथा सांस्कृतिक लेनदेन की भी भूमि समतल हुई। बहुत से शोधकर्ताओं का मानना है कि इसी मिलन और संगम का नतीजा है कि कश्मीरी शालें सारी दुनिया में पशमीना और तूस के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
मीर सैयद अली हमदानी ने कश्मीर की दूसरी यात्रा के दौरान थोड़ा समय लद्दाख़ में भी बिताया। वहां से वह अपने साथ एक विशेष प्रकार का ऊन लेकर आए जो विशेष प्रकार की पहाड़ी बकरी से मिलता है। उन्होंने इस ऊन से शाल बुनी। इस घटना का कशमीरी शाल की बुनाई पर बड़ा गहरा असर पड़ा। आज भी यह विशेष प्रकार की शाल बहुत क़ीमती होती है बल्कि सबसे महंगी कशमीरी शाल यही है। मीर सैयद अली हमदानी की इस पहल ने कशमीर के शाल उद्योग को बिलकुल नए चरण में पहुंचा दिया। यह शालें बहुत नर्म और बहुत गर्म होती हैं जैसे जैसे पुरानी होती जाती हैं उनकी सुंदरता और क़ीमत बढ़ती जाती है। इस शाल ने कश्मीर की आर्थिक स्थिति पर भी बहुत अच्छा असर डाला। इस लिए देखा जाए तो मीर सैयद अली हमदानी भारत के लिए केवल धर्मगुरु और प्रचारक नहीं थे बल्कि एक कलाकार और उद्यमी भी थे जिन्होंने इस क्षेत्र के उद्योग में बड़ा विकास उत्पन्न किया। इसी लिए कश्मीर के इतिहासकार मानते हैं कि जब मीर सैयद अली हमदानी का कश्मीर आगमन हुआ तो इस क्षेत्र की अर्थ व्यवस्था के पतन का दौर समाप्त हो गया और इसका कारण स्थानीय लोगों के विचारों, संस्कृति और आर्थिक जीवन में आने वाली क्रान्ति थी।
इतिहासकार बताते हैं कि जिस समय मीर सैयद अली हमदानी कशमीर पहुंचे 12 हज़ार मूर्तिकार मूर्तियां बनाते थे और यह उनका पेशा था। मीर सैयद अली हमदानी के प्रयासों के नतीजे में यह कलाकार मूर्तियों के बजाए सुदंर शिलालेख बनाने लगे जिन्हें मस्जिदों, मक़बरों महलों और अन्य स्थानों पर प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार यह ईरानी इस्लामी कला भी कश्मीर में फैल गई। इस महान विद्वान की शैली यह थी कि यदि किसी भी बुरी प्रथा को रोकना चाहते तो पहले ही उसका सार्थक और उचित विकल्प खोज लेते थे और उसके प्रचार प्रसार के माध्यम से प्रथा में बदलाव लाते थे। उनकी शैली इतनी अच्छी थी कि कभी भी टकराव जैसी कोई स्थिति उत्पन्न नहीं होती थी।