मौलाना जलालुद्दीन मौलवी-12
मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी के उच्च विचारों का दुनिया की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और बहुत से बुद्धिजीवी उनके विचारों से प्रभावित हुए हैं।
मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी के उच्च विचारों का दुनिया की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और बहुत से बुद्धिजीवी उनके विचारों से प्रभावित हुए हैं। मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी 13वीं शताब्दी ईसवी के प्रख्यात कवि थे और फ़ारसी भाषी क्षेत्रों में भी लोग उनकी शायरी व ज्ञान का लोहा मानते थे। आज के कार्यक्रम के बारे में भी हम इस महान विद्वान की कुछ रचनाओं के बारे में चर्चा करेंगे।
अब यह प्रश्न उठता है कि मौलवी, मौलवी कैसे बने? उनमें क्या विशेषता थी और क्या परिस्थिति उत्पन्न हुई कि उन्होंने परिज्ञान के इस अथाह समुद्र में ग़ोते लगाये और इतनी सारी मोतियों को एकत्रित कर सके। मौलाना को गुज़रे हुए लगभग आठ शताब्दियां हो रही हैं और अब भी लोग मौलाना के परिज्ञान और उनके ज्ञान के समुद्र से लाभान्वित हो रहे हैं और उनके शुद्ध विचारों से लाभ उठा रहे हैं और पूरे विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि यह प्रक्रिया अगली शताब्दियों तक भी जारी रहेगी।
मौलवी स्वयं को नहर बनाने वाला कहते थे और इस नहर में पानी जारी करते थे ताकि आने वाले बारी बारी से इस नहर के किनारे बैठें और इससे अपनी प्यास बुझाएं।
मौलवी के हवाले से बयान किया गया है कि एक दिन वह अपने किसी मित्र के कमरे में गये तो उन्होंने देखा कि वह मसनवी को सिर के नीचे तकिये की भांति रखे हुए हैं, वह क्रोधित हो गये और उन्होंने कहा यह सिर के नीचे रखने वाली और तकिया बनने वाली किताब नहीं है, यह ऐसी किताब है जो विश्व विख्यात होगी। मौलाना की यह भविष्यवाणी आज व्यवहारिक हो चुकी है। इसका कारण यह है कि मौलवी अच्छी बातें भी करते हैं और इस बात से भी अवगत थे कि दूसरों के साथ कैसे भला व्यवहार किया जा सकता है और कौन सी चीज़ सदैव बाक़ी रहती है और कौन सी चीज़ समय के बीतने के साथ समाप्त हो जाती है।
मौलवी की रचनाओं और पुस्तकों पर शोध करने वालों का कहना है कि मौलवी के बाक़ी रहने का रहस्य, मौलाना और शम्स तबरीज़ी की अद्वितीय व सबसे अलग मुलाक़ात है। इन लोगों का मानना है कि मौलाना, शम्स तबरीज़ी से मिलने तथा उनके साथ उठने बैठने के बाद ही मौलवी हुए। कुछ लोगों का यह मानना है कि मौलवी, शम्स तबरीज़ी से मुलाक़ात से पहले तक ग़ज़ाली की भांति थे । अबू मुहम्मद ग़ज़ाली, उन बुद्धिजीवियों में से जो अपने समय में धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र तथा वादशास्त्र में दक्ष थे। मुहम्मद ग़ज़ाली वह थे जिन्होंने 55 वर्ष की कम आयु में महत्वपूर्ण किताबें और रचनाएं लिखी हैं और इस्लामी सभ्यता व संस्कृति की बहुत अधिक सेवा की है।
मौलवी, ग़ज़ाली के दोस्त और उनके चाहने वाले थे और उनकी पुस्तकों का बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन करते थे और उसे याद कर लेते थे। मौलाना, शम्स तबरीज़ी से मुलाक़ात से पहले तक अन्य धर्मगुरूओं की भांति एक धर्मगुरू, मुफ़्ती और उपदेशक थे किन्तु शम्स तबरीज़ी से संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद जिसका उन्होंने वर्णन भी किया है, उनके व्यक्तित्व में भारी परिवर्तन आ गया। मौलवी ने फ़ीहे मा फ़ीहे नामक पुस्तक में इस बिन्दु की ओर संकेत करते हुए कि शम्स तबरीज़ी ने उन्हें प्रेमी नामक एक मोती का उपहार दिया है। उसके बाद से उनके व्यक्तित्व में भारी बदलाव पैदा हो गया और उन्होंने अपने भीतर एक ऐसी ताज़गी और प्रफुल्लता का आभास किया जिसके बाद उन्होंने अपनी अमर रचना लिख डाली।
मौलवी, शम्स तबरीज़ी से मुलाक़ात से पहले तक स्वयं उनके अनुसार, एक प्रसिद्ध सज्जादा नशीन थे। एक सामान्य धर्मगुरू और धर्मगुरू के पुत्र जिनके पास मौजूद मालूमात का सभी सम्मान करते थे किन्तु यह व्यक्ति आज का मौलवी नहीं था जिसे पूरी दुनिया पहचानती है।
शम्स तबरीज़ी ने मौलवी के साथ जो सबसे पहला और मुख्य कार्य किया वह उनके संबंधों की जड़ को समाप्त करना था। शम्स की नज़र में मौलाना वह बाज़ थे जिनके संबंधों ने उनके पर जकड़ लिए थे। वह आए और उन्होंने इस बाज़ के पर और पैर से इन संबंधों की ज़ंजीरों को खोल दिया। शम्स तबरीज़ी ने मौलाना को अध्ययन, सामाजिक लगाव, पढ़ाने, दोस्तों व शिष्यों के साथ उठने बैठने जैसे सामाजिक बंधनों से अलग कर दिया और उन्होंने उन्हें एक ऐसा व्यक्ति बना दिया जिसने अभी अभी जन्म लिया हो।
मौलवी की रचनाओं की मुख्य विशेषता, उनके बयानों का नवीन होना थी। उनकी बातें किसी भी संबोधक को थकाती नहीं थी क्योंकि वह ताज़ा होती थीं। मौलवी अपनी ज़बान की इस विशेषता से स्वयं अवगत थे और यही कारण था कि उन्होंने स्वयं को ईद की संज्ञा दी है।
ईद अर्थात नया दिन, यह वह दिन होता है जब लोग नये कपड़े पहनते हैं और पूरी दुनिया नया कपड़ा पहनी है। हर जगह ताज़गी और प्रफुल्लता का राज होता है। जो व्यक्ति स्वयं को ईद कहता है निश्चित रूप से उसने अपने भीतर इसका अनुभव अवश्य किया होगा और उसने यह पाया होगा कि वह पूरी तरह बदल चुका है और ईद हो चुका है। इस अनुभव के आधार पर मौलवी की बातें, घिसी पिटी और उबाऊ होने से दूर होती हैं। उनकी किताबों को बारंबार पढ़ा जा सकता है और उससे हर हर नई बातें हासिल की जा सकती हैं और नया आयाम प्राप्त किया जा सकता है। पूरे साहस से यह कहा जा सकता है कि दुनिया में बहुत ही कम ऐसी किताबें हैं जिनमें यह विशेषताएं पायी जाती हैं।
मौलवी ने अतीत और भविष्य को तबाह कर दिया। यही कारण था कि उनके बयन नये और ताज़ा हुआ करते थे। वह समुद्र से जुड़े हुए हैं और जो भी व्यक्ति समुद्र और कभी न समाप्त होने वाले ख़ज़ाने से जुड़ा हुआ है उसकी बातें सदैव ताज़ा रहती हैं और वह सदैव अपने ख़रीदारों को मोतियों से भरे सीप पेश करता है। कभी भी उनके ख़रीदार दुखी नहीं होते और अपने भंडारण की समाप्ति की ओर से भयभीत नहीं होते। मौलाना ने ख़ज़ाने के ख़ाली होने से भयभीत हुए बिना, अपने संबोधकों को ईश्वरीय ज्ञान व परिज्ञान का महाभंडारण दिया है। मौलवी का प्रसिद्ध परिज्ञानी वाक्य है कि दुख को नहीं पहचानते। मौलाना के चहीते परिज्ञान में दुख का कोई स्थान नहीं है, वह प्रेम की सत्ता तक पहुंच गये और उन्होंने विभिन्न प्रकार के लाभ उठाए हैं।
मौलाना का पूरा अस्तित्व हर प्रकार से तृप्त है। उन्होंने मसनवी में भी इस बिन्दु की ओर संकेत किया है कि प्रेम, तृप्त कर देता है और प्रेमी से प्यास और भूख छीन लेता है। मौलाना की शिक्षाओं में दो चीज़ें लोगों को तृप्त कर देती हैं। एक प्रेम दूसरा ईमान। ईमान पवित्र खाना है। व्यक्ति जब वह खा लेता है तो वह पूरी तरह तृप्त हो जाता है। प्रेम भी उसी तरह है।
शम्स तबरीज़ी ने मौलाना को सिखाया कि खुले वातावरण में पूरी आज़ादी से उड़ना, संबंधों से लगाव के विरोधाभासी है। उसके बाद उन्होंने एक मामला करने के लिए उन्हें सुझाव दिया। यह एक ऐसा मामला था जिसमें जीत की कोई भी उम्मीद नहीं थी, मौलवी रिस्क लेने के लिए तैयार हैं। उनका मानना है कि प्रेम, ला उबाली व बेकार है, उन्हें किसी भी चीज़ की परवाह नहीं है। आगे का नहीं सोचा, नुक़सान और फ़ायदे का नहीं सोचा। वह प्रेमी से केवल पवित्रता चाहते हैं बस, पवित्र अर्थात बिना कुछ जीते हर चीज़ को हारना। प्रेम, पूरे के पूरे प्रेमी को चाहता है न कि उसके कुछ भाग को। शम्स तबरीज़ी ने मौलवी से इसके अतिरिक्त उनसे कुछ और नहीं मांगा कि हर चीज़ को बिना किसी आशा के क़ुरबान कर दे और मौलाना ने भी यह काम किया।
अंततः प्रेम ने भी उनसे वफ़ा की और उन्हें हर चीज़ प्रदान की। उन्हें ऐसा सीना प्रदान किया जो उनके अनुसार, दुनिया की मधुशाला था। उन्हें एक चाभी प्रदान की जिससे दुनिया की हर चीज़ खुल जाती थी। प्रेम ने मौलाना के दिल को चंद्रमा और समुद्र के गुणों से संपन्न बना दिया। (AK)