ईरान के समकालीन बुद्धिजीवी-4
उथल-पुथल भरे वर्तमान काल में इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को एक विशेष स्थान प्राप्त है।
उथल-पुथल भरे वर्तमान काल में इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को एक विशेष स्थान प्राप्त है। वे ऐसे दूरदर्शी और होशियार राजनेता तथा अद्वितीय परिज्ञानी या तत्वदर्शी थे जिन्होंने नैतिक शास्त्र, परिज्ञान, दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र, राजनीति यहां तक कि साहित्य के क्षेत्रों में बहुत ही समृद्ध पुस्तकें लिखीं। इमाम ख़ुमैनी ने ४० वर्ष की आयु तक अत्याचार के विरुद्ध अपनी गतिविधियों के अतिरिक्त नैतिकशास्त्र तथा परिज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। इमाम ख़ुमैनी ने “शर्हे दुआए सहर” और “मिस्बाहुल हिदाया” नामक पुस्तकों में, परिज्ञान को बहुत ही सूक्ष्म आयमों से प्रस्तुत किया है। यह पुस्तकें, युवाकाल में ही स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के परिज्ञान की क्षमता और योग्यता को प्रदर्शित करती हैं। उन्होंने धर्मशास्त्र तथा इस्लामी नियमों के बारे में ४० वर्ष की आयु के पश्चात पुस्तकें लिखना आरंभ कीं। कुल मिलाकर स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी को बहुत ही जागरूक धर्मगुरू और कुशल एवं दूरदर्शी राजनेता कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि वे एकांतवास में रहने वाले कोई साधक मात्र नहीं थे बल्कि वे एक दूरदर्शी मार्गदर्शक थे जिन्होंने अंधकार के काल में मार्गदर्शन की मशाल अपने हाथों में ली, शाह की तानशाही शाही व्यवस्था को धराशाई किया और ईरान में इस्लामी क्रांति को सफल बनाया। वर्तमान समय में इमाम ख़ुमैनी की राजनैतिक एवं धार्मिक क्रांति ने लोगों के सामने चमकते हुए आध्यात्मिक क्षितिज खोल दिये हैं।
अन्तर्ज्ञान या परिज्ञान के क्षेत्र में इमाम ख़ुमैनी की प्रथम रचना का नाम “शरहे दुआए सहर” है। इसे उन्होंने २७ की आयु में संकलित किया था। रमज़ान के महीने में भोर समय पढ़ी जाने वाली दुआ, “दुआए सहर” की महानता एवं उसके महत्व के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के बहुत से वक्तव्य पाए जाते हैं। यह दुआ पैग़म्बरे इस्लाम के एक पौत्र इमाम मुहम्मद बाक़र की यादगार है। इमाम मुहम्मद बाक़र अलैहिस्सलाम, रमज़ान के महीने में भोर समय इस दुआ को पढ़ा करते थे। इमाम ख़ुमैनी “दुआए सहर” को संकलित करने और उसकी व्याख्या का उद्देश्य बयान करते हुए कहते हैं कि ईश्वरीय दासों पर ईश्वर की अनुकंपाओं और विभूतियों में से एक, महान अनुकंपा, वे दुआए हैं जो ईश्वर के सदाचारी बंदों की ओर से हमतक पहुंची हैं। यह “वहि” अर्थात ईश्वरीय संदेश के ख़जानों में से है। यह एसी दुआ हैं जो सृष्टिकर्ता तथा उनके दासों के बीच आध्यात्मिक संपर्क स्थापित करती हैं। इन्हीं में से एक की मैं अपनी क्षमता के अनुसार कुछ आयामों से व्याख्या करना चाहता हूं।
दुआए सहर का महत्व इसलिए है कि इसमें केवल ईश्वर के नामों का बहुत ही रोचक एवं शिक्षाप्रद ढंग से वर्णन किया गया है। इस दुआ की व्याख्या में इमाम ख़ुमैनी ने अपने अन्तर्ज्ञान संबन्धी क्षमताओं का खुलकर प्रदर्शन किया है। इस दुआ की व्याख्या में इमाम ख़ुमैनी ने ईश्वर के हर नाम के अर्थ और उसके महत्व पर प्रकाश डाला है। दुआए सहर की व्याख्या के दूसरे भाग में इसी प्रकार वे ईश्वर के मार्ग पर चलने वालों से चाहते हैं कि ईश्वर के नामों की संख्या और उनमे से प्रत्येक के अर्थ के अनुरूप उस ओर विशेष ढंग से ध्यान दे तथा दूसरी ओर ईश्वर के सभी नामों को एक अस्तित्व में, जो वास्तव में ईश्वर ही है उसका साक्षात करे। यह पुस्तक अरबी भाषा में लिखी गई है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए अधिक लाभदायक है जो परिज्ञान या अन्तर्ज्ञान से भलिभांति अवगत हैं।
परिज्ञान या रहस्यवाद के बारे में इमाम ख़ुमैनी की एक अन्य पुस्तक का नाम “मिस्बाहुल हिदाया” है। परिज्ञान की दृष्टि से, परिपूर्ण व्यक्ति के बारे में अबतक बहुत सी पुस्तकें लिखी गई हैं विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम तथा दूसरों पर उनके अधिकारों के बारे में किंतु मुसलमान विद्वानों का मानना है कि इस बात को पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इन पुस्तकों में से कोई भी पुस्तक परिपूर्ण व्यक्ति के बारे में उस विस्तार से नहीं बता सकी है जिस हिसाब से इमाम ख़ुमैनी ने अपनी पुस्तक में व्याख्या की है। “मिस्बाहुल हिदाया” नामक पुस्तक में इमाम ख़ुमैनी ने जटिल, उच्च और महत्वपूर्ण विषयों को परिज्ञान के साथ इस प्रकार मिश्रित किया है कि वे आयतों तथा पैग़म्बरे इस्लाम एवं उनके परिजनों के पवित्र कथनों और दार्शनिक तर्कों के साथ पूर्ण रूप से समन्वित हैं। इस पुस्तक को इमाम ख़ुमैनी ने २९ वर्ष की आयु में सन १९३१ में लिखा था। इस्लामी विद्वानों के अनुसार इमाम ख़ुमैनी के भीतर पाए जाने वाले आध्यात्मक, और उनकी मानवीय विशेषताओं को इस पुस्तक में स्पष्ट ढंग देखा जा सकता है। हालांकि यह पुस्तक उनकी आरंभिक रचनाओं में से है किंतु परिज्ञान तथा व्यापकता की दृष्टि से यह इतनी परिपूर्ण है कि बहुत से अवसरों पर स्वयं इमाम ख़ुमैनी तथा अनय महान परिज्ञानियों ने इससे लाभ उठाने की अनुशंसा की है। इस पुस्तक की सूचि में दर्ज विषय या शीर्षक, इमाम ख़ुमैनी के फ़लस्फ़ए इशराक़ की ओर झुकाव और सोहरवर्दी तथा मीर दामाद जैसे महान दर्शनशास्त्रियों से उनके प्रभावित होने को दर्शाते हैं।
वर्ष १९३९ में इमाम ख़ुमैनी ने एक अन्य पुस्तक लिखी जिसका नाम था “असरारे नमाज़”। इस पुस्तक में नमाज़ के नियमों, उसके रहस्यों और सूरए हम्द की बड़े ही रोचक ढंग से व्याख्या की गई है। सूरए हम्द की व्याख्या में इमाम ख़ुमैनी ने सुरए फ़ातेहा के अति सूक्ष्म एवं परिज्ञान से संबन्धित बिंदुओं की ओर संकेत किया है। पवित्र क़ुरआन की विभिन्न व्याख्याओं में व्याकरण, आयतों के उतरने का विवरण, आयतों से तातपर्य तथा नैतिकशास्त्र, आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि आदि से बहस की गई है। वास्तव में पवित्र क़ुरआन की व्याख्या का अर्थ है आयतों के रहस्यो को स्पष्ट करना। पवित्र क़ुरआन का प्रत्येक व्याख्याकार अपनी समस्त क्षमताओं के आधार पर यह कार्य करने का प्रयास करता है और अपने ज्ञान के आधार पर ईश्वरीय पुस्तक से पर्दे को हटाने की कोशित करता है। क़ुरआन की व्याख्या के महत्व के बारे में इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि यह ईश्वरीय पुस्तक जो ईश्वर के कथनानुसार मार्गदर्शक और शिक्षा देने वाली पुस्तक है तथा मानवता का पथप्रदर्शन करने वाली है अतः व्याख्याकार को पवित्र क़ुरआन की हर आयत की व्याख्या बहुत ही ध्यानपूर्वक ढंग से करनी चाहिए।
इमाम खुमैनी, परिज्ञान की दृष्टि से पवित्र क़ुरआन की व्याख्या करने में रुचि रखते थे। इसका कारण यह है कि इस प्रकार की व्याख्या में आयतों के रहस्य और उसमें किये गए संकेतों को स्पष्ट किया जाता है और आयतों की निहित बातें स्पष्ट की जाती हैं। इमाम ख़ुमैनी का यह मानना था कि पवित्र क़ुरआन में अन्तर्ज्ञान से संबन्धित महत्वपूर्ण बिंदु पाए जाते हैं और आध्यात्म तथा अन्तर्ज्ञान के बारे में पवित्र क़ुरआन से अच्छी कोई भी पुस्तक हो ही नहीं सकती। धर्म की पहचान तथा पवित्र क़ुरआन की व्याख्या को समझने में अन्तर्ज्ञान की भूमिका को इमाम ख़ुमैनी बहुत महत्वपूर्ण मानते थे और कहते थे कि अन्तर्ज्ञान की दृष्टि से इस्लाम को उचित ढंग से समझा जा सकता है। सूरए फ़ातेहा की व्याख्या में इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि इस सूरे में समस्त ज्ञान मौजूद हैं किंतु विशेष बात यह है कि मनुष्य को समझदार होना चाहिए। उसको इस सूरे में चिंतन-मनन करना चाहिए। हालांकि हम इस योग्य नहीं हैं। हम कहते हैं कि “अलहम्दो लिल्लाहे रब्बिलआलमी” अर्थात प्रशंसनीय है वह ईश्वर जिसके लिए सारी प्रशंसाए हैं। जबकि पवित्र क़ुरआन यह नहीं कह रहा है। वह यह कहता है कि प्रशंसा तो केवल ईश्वर के लिए ही है और वह उसीसे विशेष है। इस सूरे के बारे में वे कहते हैं कि सृष्टि में कोई एसा प्राणी नहीं है जो ईश्वर की प्रशंसा न करता हो किंतु हम लोग सृष्टि में की जाने वाली ईश्वर की प्रशंसा को समझते नहीं हैं।
सूरए फ़ातेहा की व्याख्या करते हुए इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि सिराते मुस्तक़ीम वह सीधा मार्ग है जिसका एक छोर इस ओर है और दूसरा द्वा ईश्वर है। वे कहते हैं कि नमाज़ पढ़ते समय आप जो यह कहते हैं कि हे ईश्वर मुझ को सीधे रास्ते का दिशा निर्देशन कर। उस मार्ग का जिसपर चलने वालों को तूने अपनी अनुकंपाओं का पात्र बनाया न उनके मार्ग पर जिनपर तूने अपना प्रकोप उतारा और न ही पथभ्रष्ट। यहां पर सीधे मार्ग से तात्पर्य, वहीं इस्लाम का मार्ग है जो मानवता का मार्ग है। यह परिपूर्णता का मार्ग है जो ईश्वर की ओर जाता है। तुम इसी सीधे मार्ग पर चलो जो मानवता का मार्ग है, न्याय का मार्ग है और वास्तविक इस्लामी मार्ग यही है। इस सीधे मार्ग पर यदि बिना भटके हुए तुम सीधे चलते रहे तो यह मार्ग सीधा ईश्वर से जा मिलता है।