Apr ०७, २०१९ १५:५१ Asia/Kolkata

आपको अवश्य याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था ईरानी सेना और जनता ने जिस अभूतपूर्व साहस व शूरवीरता का परिचय दिया था वह इराकी सेना के अतिक्रमण के रुक जाने का कारण बना।

कमान 99” नामक कार्यवाही के दौरान ईरान के 140 युद्धक विमानों ने इराकी आसमान पर उड़ान भरकर और इराक के महत्वपूर्ण आर्थिक और सैनिक ठिकानों पर बमबारी करके अपनी शक्ति का परिचय दिया। ईरान की नौसेना ने भी फार्स की खाड़ी में स्थित इराकी तेल की जेटियों और इराकी युद्धक नौकाओं पर हमला करके इराक की नौसेना को भारी क्षति पहुंचाई। ईरान की सशस्त्र सेना की प्रतिक्रिया उन सूचनाओं के बिल्कुल खिलाफ थीं जिन्हें इराक के पूर्व तानाशाह सद्दाम को दिया गया था। इराकी सुरक्षा तंत्रों ने क्षेत्र की रूढ़िवादी अरब सरकारों, अमेरिका और पश्चिम की सहायता से ईरान के अंदर की स्थिति के बार में जानकारी एकत्रित किया था। ईरान के अंदर से एकत्रित की गयी जानकारी के बारे में एक इराकी कमांडर लिखता है” ईरान के अंदर की बहुत ही सूक्ष्म राजनीतिक और आर्थिक जानकारियों और इसी प्रकार ईरान के अंदर के विरोधी राजनीतिक गुटों की लड़ाई की भी सूचना इराक को दी गयी थी। दूसरे शब्दों में उस  समय ईरानी सेना की जो दशा थी उसकी सूक्ष्म जानकारी इराकी सेना को थी। उस समय बहुत से ईरानी सैनिक और सैन्य अफसर सेना से भाग गये थे। इसी प्रकार सऊदी अरब ने ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से लेकर उस समय तक की ईरान की समस्त सैन्य जानकारियों को इराक को दे दिया था। सऊदी अरब ने इन जाकारियों को अमेरिकी तंत्रों से हासिल किया था। ईरान में रज़ा खान के तानाशाही काल शासन काल में सावाक नाम की जो गुप्तचर सेवा थी उसके बहुत से सदस्य व एजेन्ट अमेरिका के लिए जासूसी का कार्य अंजाम देते थे। इसी प्रकार तेहरान में स्थित कुछ देशों के दूतावासों के माध्यम से भी ईरान की सशस्त्र सेना की स्थिति की जानकारी इराकी सेना को दी जाती थी। इस प्रकार इराकी नेतृत्व ईरान की सैनिक शक्ति और उसके परिवर्तनों पर नज़र रखता था।

 

ईरान की बहादुर जनता का जो साहसिक प्रतिरोध और प्रतिरोध की भावना थी उसके बारे में सद्दाम और उसके सलाहकारों ने सोचा भी न था और यही उसकी गलत समीक्षा युद्ध के आरंभिक दिनों में ही सद्दाम की पराजय का कारण बनी।

इसी बीच मात्र ईरानी जनता का साहसिक प्रतिरोध था जिस पर इराकी सैन्य कमांडरों ने ध्यान नहीं दिया था। ईरानी जनता ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया इराकी सैन्य कमांडरों ने कभी उसकी कल्पना भी नहीं की थी। वास्तव में ईरान पर सैन्य हमला करने के फैसले का आधार इराकी सुरक्षा तंत्र की जानकारियां थीं और ईरानी जनता के अंदर जो अदम्य साहस के साथ प्रतिरोध की भावना मौजूद थी उसकी जानकारी से इराकी सुरक्षा तंत्र बहुत दूर थे। एक वरिष्ठ इराकी सैन्य अफसर इराकी सेना को मिलने वाली विफलता की समीक्षा करते हुए कहता है” अगर इराकी नेतृत्व ईरान पर हमला करना चाहता था तो उसे और इराक की सैनिक इकाइयों को बहुत ही सूक्ष्म जानकारियों की ज़रूरत थी परंतु ईरानी जनता के संभावित प्रतिरोध के बारे में जो जानकारियां  दी गयी थीं वे सही नहीं थीं।“

ईरान की सैनिक शक्ति और ईरानी जनता के प्रतिरोध की भावनाओं की गलत समीक्षा के बाद सद्दाम ने युद्ध विराम की घोषणा की। इराक के पूर्व तानाशाह सद्दाम ने युद्ध के दूसरे ही सप्ताह में इराकी जनता को संबोधित करते हुए कहा” ज़मीन से संबंधित इराक का जो लक्ष्य था वह उसने प्राप्त कर लिया है और उनका देश दुश्मनी छोड़कर वार्ता की मेज़ पर जाना चाहता है। अलबत्ता इराकी सेना ईरानी जनता के साहसिक प्रतिरोध के बावजूद बहुत से स्थानों पर प्रगति करके ईरानी क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था उसका एक बहुत बड़ा कारण ईरानी जनता के पास आधुनिकतम संभावनाओं का न होना था। क्योंकि सद्दाम की अतिक्रमणकारी सेना जिन आधुनिकतम संभावनाओं से लैस थी उसके मुकाबले में ईरानी जनता के पास बहुत ही कम हथियार थे। दूसरे शब्दों में अगर यह कहा जाये कि इराकी सेना के मुकाबले में ईरानी जनता निहत्थी थी तो बुरा न होगा। सद्दाम ने तीन दिनों के भीतर ईरान के खुज़िस्तान प्रांप्त पर कब्ज़ा करने की बात कही थी परंतु तीन दिन ही नहीं आठ साल बीत गये परंतु सद्दाम का स्वप्न साकार नहीं हो सका जबकि उसे पूरब- पश्चिम का व्यापक समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार की परिस्थिति में सद्दाम ने युद्ध विराम की बात की।

वास्तव में सद्दाम ने युद्ध विराम की बात करके ईरान पर अतिक्रमण के मुकाबले में अपनी हार स्वीकार कर ली। इराकी सेना हर प्रकार के आधुनिकतम हथियारों एवं सम्भावनाओं से लैस थी उसके बावजूद वह ईरान पर हमला करके अपने लक्ष्यों को प्राप्त न कर सकी। इसी कारण इराकी सेना अनुचित रक्षा मोर्चों पर रहने के लिए मजबूर हो गयी। सद्दाम ने ईरान के सामने युद्ध विराम का जो प्रस्ताव रखा उसे ईरान ने स्वीकार नहीं किया क्योंकि ईरान के बहुत से भागों पर इराक की अतिक्रमणकारी सेना ने कब्ज़ा कर रखा था। सद्दाम सोच रहा था कि ईरान के सामने आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा आदि की जो कठिनाइयां व समस्याएं हैं उनके दृष्टिगत वह वार्ता की मेज़ पर ईरान से विशिष्टताएं ले सकता है और ईरानी भूमि के बहुत बड़े भाग को ईरान से अलग कर सकता है। ईरान में जो समस्यायें व कठिनाइयां मौजूद थीं उन सबके बावजूद ईरान में मौजूद किसी ने भी सद्दाम के प्रस्ताव को गम्भीरता से नहीं लिया। सद्दाम अगर वास्तव में युद्ध विराम और युद्ध को समाप्त करना चाहता था तो उसे चाहिये था कि ईरान के जिन क्षेत्रों पर उसने कब्ज़ा कर लिया था उनसे पीछे हट जाता। इसी प्रकार उसने ईरान- इराक सीमा विवाद के बारे में वर्ष 1975 में जो अलजीरिया समझौता हुआ था उसे स्वीकार कर लेता परतुं ईरान के जिन क्षेत्रों पर उसने कब्ज़ा कर लिया था उन पर बाकी रहने के साथ वार्ता की मेज़ पर आना चाह रहा था परंतु सद्दाम ने आरंभिक हमले में जिन क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था उनसे पीछे हटना उसके लिए आत्म हत्या के समान था। इसलिए सद्दाम ने जिन क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था उन पर बाकी रहने के साथ उसने वार्ता का प्रस्ताव दिया। क्योंकि सद्दाम यह सोच रहा था कि ईरान को सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक सहित विभिन्न कठिनाइयों का सामना है और उसने जिन क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया है उन्हें दोबारा स्वतंत्र करा लेने की क्षमता ईरान के अंदर नहीं है इसलिए विशिष्टता लेने के लिए ईरान को मजबूर किया जा सकता है। यह सोचकर सद्दाम ने अपने सैनिकों को मोर्चों पर तैनात रखा और ईरान पर अतिक्रमण करने की दोबारा ग़लती दोहराई। कड़ाके की सर्दी पड़ने का मौसम आ गया, इराकी सैनिक उचित मोर्चों पर तैनात होने या ईरानी सेना को नुकसान पहुंचाने के बजाये ईरान की सशस्त्र सेना को तैयारी का अवसर दे दिया जिसका लाभ उठाकर उसने इराकी सेना से बहुत से उन क्षेत्रों को दोबारा छीन लिया जिन पर उसने कब्ज़ा कर रखा था। एक इराकी कमांडर कहता है” इराकी नेतृत्व के दृष्टिकोण का आधार ईरानी राजनेताओं के मध्य कड़ा मतभेद और ईरान की आंतरिक समस्याएं थी। इराकी  नेतृत्व सोचता था कि आंतरिक समस्याओं के कारण ईरान के अंदर इराकी सैनिकों को पीछे धकेलने की क्षमता नहीं है।