Apr १९, २०१६ ०५:३३ Asia/Kolkata

ईरान के छठी हिजरी क़मरी के मशहूर शायर निज़ामी गन्जवी है।

निज़ामी गन्जवी का नाम हकीम अबू मोहम्मद इल्यास था। उनके जन्म की सही तारीख़ स्पष्ट नहीं है लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि, 530 से 540 हिजरी क़मरी के बीच उनका जन्म हुआ है।  

निज़ामी गन्जवी तत्कालीन ईरान के भाग रहे शहर गन्जे में पैदा हुए। गन्जे ईरान के उत्तर में कान्जाचाय और गन्जे नदियों के बीच में स्थित है। उस समय गन्जे ईरान का भाग था और इस समय यह आज़रबाइजान गणराज्य का शहर है।उस समय गन्जे फ़ारसी साहित्य व शायरी का मुख्य केन्द्र समझा जाता था।

ख़ाक़ानी, फ़लकी शरवानी और अबुल आला गन्जवी जैसे मशहूर शायर इसी शहर की रौनक़ थे। इसी प्रकार महसती और निज़ामी की शायरी का भी गन्जे को फ़ार्सी शायरी के केन्द्रों में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान है। निज़ामी ने लगभग 70 साल गन्जे में ज़िन्दगी गुज़ारी और 599 हिजरी क़मरी में इसी शहर में उनका देहान्त हुआ। कुछ साल बाद उनकी क़ब्र पर एक ज़रीह रखी गयी और प्रशसंक उनके मक़बरे का दर्शन करने जाने लगे। जब प्राचीन गन्जे शहर के पास नये गन्जे शहर का निर्माण हुआ तो पुराना गन्जा शहर उजड़ गया और इस प्रकार निज़ामी का मक़बरा नए शहर का हिस्सा बन गया। इस वक़्त उनका मक़बरा नए शहर के बाहर स्थित है। नेज़ामी का मक़बरा वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूनों में गिना जाता है।

यूं तो निज़ामी गन्जवी के बारे में ईरानी व विदेशी शोधकर्ताओं के अनेक शोधकार्य प्रकाशित हुए हैं किन्तु अभी भी उनके जीवन के बहुत से पहलु अनछुए हैं। निज़ामी के जीवन और उनके विचारों के बारे में अधिक जानने के लिए, जीवनी लेखकों के कथन और ख़ुद निज़ामी की रचनाओं का सहारा लेना पड़ेगा जिसमें उन्होंने अपनी ज़िन्दगी और विचारों का कहीं कहीं उल्लेख किया है।

नेज़ामी ने अपनी रचनाओं में विभिन्न स्थानों पर अपने परिवार का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने पिता का नाम यूसुफ़ और मां को कुर्द जाति की मुखिया के रूप में याद किया है। इसी प्रकार उन्होंने अपने शेरों में अपनी बीवी और बेटे का भी उल्लेख किया है।

मौजूद दस्तावेज़ के अनुसार, नेज़ामी ने एक व्यापारी परिवार में जन्म लिया और निश्चिन्त होकर बचपन का समय पढ़ाई में बिताया। उन्होंने अपने समय में ज्ञान की प्रचलित विभिन्न शाखाओं का ज्ञान हासिल किया। उन्होंने अपने शेरों में फ़ारसी व अरबी पद्य व गद्य के साथ साथ ज्योतिष शास्त्र, रसायन शास्त्र, दर्शन शास्त्र और धर्मशास्त्र का भी ज्ञान हासिल करने का उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी नौजवानी व जवानी के वर्ष स्कूलों में पढ़ाई में बिताए।

जैसा कि अभी इस बात का उल्लेख किया कि निज़ामी गन्जे के एक समृद्ध व्यापारिक परिवार में जन्मे थे, यही कारण था कि उन्हें आजीविका कमाने की कोई चिंता नहीं थी। इसलिए वे जवानी की बहार देखते ही अध्ययन में लीन होकर एकान्तवास का जीवन बिताने लगे। बहुत से शोधकर्ताओं का मानना है कि निज़ामी के इस एकांतवासी जीवन का प्रभाव उन पर इतना ज़्यादा था कि उनकी उम्र 40 साल भी नहीं हुयी थी कि उनके व्यवहार व बातचीत से रोब झलकता था।

निज़ामी अपने समय के मशहूर शायरों में थे। उनकी शैली में नयापन था किन्तु अपने समय के शायरों के विपरीत उन्होंने शायरी को आजीविका का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने कभी भी दरबारियों की सराहना में शेर नहीं कहे।

यूं तो निज़ामी की पांच मस्नवी बहुत मशहूर हैं जो पंज गंज के नाम से जानी जाती हैं लेकिन उन्होंने ग़ज़्लें और क़सीदे भी कहे हैं। जैसा कि उन्होंने ख़ुद कहा कि उनकी ग़ज़्लें वीणा के साथ गायी जाती थीं और उनके क़सीदों और ग़ज़्लों की शैली का उनके समकालीन शायर अनुसरण करते थे।

निज़ामी के काव्य संकलन के बचे कुछ शेरों के अलावा, वे अपनी पांच मस्नवी क लिए मशहूर हैं जिसे पंज गन्ज या ख़म्से निजामी कहते हैं। इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि निज़ामी ने पंज गन्ज मस्नवी में कहानी को बयान करने की नई शैली अपनायी है। उनकी पांच मस्वनी के शीर्षक इस प्रकार हैं, मख़ज़नुल असरार, ख़ुसरो व शीरीन, लैला व मजनून, हफ़्त पैकर और इस्कंदर नामे। इस्कंदर नामे के दो भाग हैं एक का नाम इक़बाल नामे और शरफ़ नामे।

निज़ामी के शेरों में प्रवाह और उनकी शायरी की शैली के मद्देनज़र, फ़ारसी काव्य के स्तंभों में गिना जा सकता है। यही कारण है कि बहुत से शायरों, जीवनी लेखकों और शोधकर्ताओं ने उनकी प्रशंसा की है। ऊफ़ी ने लुबाबुल अलबाब में निज़ामी के बारे में कहा है कि उन्होंने अपने शेरों से फ़ारसी साहित्य को समृद्ध किया और दुनिया के सामने अनछुए ख़्याल का दरीचा खोला है।

निज़ामी का अनुसरण करने वाले प्रसिद्ध शायर जामी ने किताब ‘नफ़हातुल उन्स’ में लिखा है कि उनकी पांच मस्नवियां जो पंज गन्ज के नाम से मशहूर हैं और उनका विदित रूप दन्तकथा जैसा लगता है लेकिन हक़ीक़त में वे ईश्वर की पहचान का माध्यम हैं।

‘हबीबुस सैर’ किताब के लेखक ख़ान्दमीर, निज़ामी की प्रशंसा में लिखते हैं कि निज़ामी ने अपनी जवानी के आरंभ से लेकर बुढ़ापे तक की ज़िन्दगी अलग थलग गुज़ारी। वे दूसरे शायरों की तरह इच्छाओं के पीछे नहीं भागे और न ही राजाओं के दरबार के चक्कर लगाए। बल्कि दूसरे शायर उनकी संगत की अभिलाशा रखते और उनकी मूल्यवान बातों से लाभ उठाते।

निज़ामी की काव्य शैली का बहुत से शायरों ने अनुसरण किया बल्कि बहुत से शायरों ने उनके अंदाज़ में मस्नवी कहने की भी कोशिश की जिनमें जामी, अमीर ख़ुसरो देहलवी, ख़्वाजवी किरमानी, वहशी बाफ़क़ी और उर्फ़ी शीराज़ी उल्लेखनीय हैं।

निज़ामी के बारे में शोध करने वाले उस्ताद मुजतबा मीवनी, फ़ारसी शायरी में निज़ामी के स्थान और बाद के शायरों पर उनके प्रभाव के बारे में कहते हैं, “ निज़ामी के शिष्यों की संख्या उनके उस्तादों से ज़्यादा थी क्योंकि जो भी किसी कहानी को काव्य के रूप में पेश करना चाहता था, वह निज़ामी की ख़म्से निज़ामी का अनुसरण करता था। यहां तक कि हाफ़िज़ ने भी अपने कुछ शेरों में निज़ामी का अनुसरण किया है।”