ईरानी संस्कृति और कला-50
ईरान की वास्तुकला में चार प्रकृतिक तत्व शामिल रहे हैं, मिट्टी, पानी, हवा और आग।
मिट्टी को वास्तुकला का प्रमुख तत्व कहा गया है। ईरान की वास्तुकला को देश में मौजूद विभिन्न प्रकार की इमारतों में स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। वास्तुकला में प्रयोग होने वाले तत्वों में एक आग भी है। भूमिका भवन के निर्माण में प्रयोग किये जाने वाल तत्वों को मज़बूत करने में आग की विशेष भूमिका है। इमारतों के निर्माण कार्य में हवा भी एक कारक के रूप में भूमिका रहती है। इसी प्रकार पानी के महत्व को भी इमारतों के निर्माण में अनदेखा नहीं किया जा सकता।
पानी का अपना अलग महत्व है। वातावरण को हराभरा रखने में पानी की भूमिका बहुत ही अहम है। ईरान में अति प्राचीनकाल से पानी को ईश्वरीय अनुकंपा के रूप में देखा जाता रहा है। पानी को दूषित और गंदा होने से रोकने के लिए कई प्रकार के काम किये गए जिनमें से एक पुलों का निर्माण भी है। ईरान में एक प्रकार की जलवायु नहीं है बल्कि अलग-अलग क्षेत्र में अलग प्रकार की जलवायु होती है। इन क्षेत्रों में बने हुए पुलों के निर्माण में स्थानीय जलवायु के हिसाब से ही इमारतों और पुलों को बनाया गया है। विगत में कुछ शासकों के काल में पुलों का निर्माण अधिक हुआ जबकि कुछ के काल में तुल्नात्मक रूप में कम हुआ।
इस्फ़हान नगर सफ़वी काल में भव्य राजधानी था। इस नगर में "ज़ायंदेरूद" नामक नदी बहती है जो इस्फ़हान को दो भागों में विभाजित करती है। इस नदी पर कई एसे पुल बनाए गए जो वास्तुकला की दृष्टि से उदाहरण सिद्ध हुए। पुलों के कारण नगरों की सुन्दरता में बढ़ोत्तरी हुई।
अब केवल पैदल ही लोग इसपर जा सकते हैं। क्योंकि पुले सीओसे, इस्फ़हान नगर के बीचों-बीच में स्थित है इसलिए यहां पर अधिकतर समय रौनक़ रहती है। इसके इर्दगिर्द दुकाने और चाय के होटल हैं। विशेष बात यह है कि इतिहास के विभिन्न कालों का अनुभव करते हुए इस्फहान का सीओसे पुल आज ही अपनी वैभवता के साथ लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किये हुए है।