इस्लामी गणतंत्र दिवस
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ईरानी कैलेन्डर में 12 फरवरदीन के दिन को इस्लामी गणतंत्र दिवस का नाम दिया गया है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Mar ३१, २०१६ १४:१२ Asia/Kolkata

ईरानी कैलेन्डर में 12 फरवरदीन के दिन को इस्लामी गणतंत्र दिवस का नाम दिया गया है।

           ईरानी कैलेन्डर में 12 फरवरदीन के दिन को इस्लामी गणतंत्र दिवस का नाम दिया गया है। यह ईरान में बहुत बड़े राजनीतिक परिवर्तन का आरंभ बिन्दु है। इस दिन ईरान के लोगों ने समूचे देश में जनमत संग्रह के बाद अपने लिए इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का चयन किया और इस दिन का नाम इस्लामी लोकतंत्र के जन्म दिन के रूप में पंजीकृत किया गया। इस जनमत संग्रह में 98 प्रतिशत से अधिक लोगों ने इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के पक्ष में मत दिया था।  

स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने जनमत संग्रह कराये जाने को आवश्यक समझा और उनके इस इतिहासिक निर्णय ने दर्शा दिया कि इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में मूल आधार जनता की राय है और जनमत संग्रह आयोजित कराये जाने से जनता के चयन और उसकी इच्छा की पुष्टि हो गयी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने जनमत संग्रह आयोजित कराये जाने के उपलक्ष्य में अपने संदेश में स्पष्ट किया कि यह जनमत संग्रह राष्ट्र के भविष्य को निर्धारित करेगा। यह जनमत संग्रह या आपकी आज़ादी व स्वाधीनता का कारण बनेगा या अतीत की भांति घुटन और दूसरे पर निर्भर होने का। यह जनमत संग्रह वह चीज़ है जिसमें सबको भाग लेना चाहिये। आप जो चाहें चयन कर सकते हैं आपको अधिकार है आप इस मतपत्र में डेमोक्रेटिक लोकतंत्र लिख सकते हैं राजशाही सरकार या जो चाहें लिख सकते हैं। इस संबंध में आप स्वतंत्र हैं।

इस जनमतसंग्रह में लगभग 99 प्रतिशत लोगों की भागीदारी ने विश्व वासियों के समक्ष दर्शा दिया कि वर्चस्ववादी शक्तियों के समस्त दावों के विपरीत इस्लामी क्रांति के मापदंड प्रजातांत्रिक हैं और ईरान की इस्लामी गएतंत्र व्यवस्था का आधार जनता की राय व उसका मत है।

 

इस दृष्टि से इस जनमत संग्रह का अंतरराष्ट्रीय संदेश है। यह संदेश, जो इस्लामी गणतंत्र के प्रति ईरानी जनता के भरपूर मत के साथ भेजा गया विश्व वासियों के लिए पूरी तरह स्पष्ट था। 12 फरवरदीन को होने वाले जनमत संग्रह के परिणाम ने इस महत्वपूर्ण बिन्दु की पुष्टि कर दी कि जो इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था अस्तित्व में आई है उसका आधार जनता की राय है और वही अपने भविष्य का निर्धारण करेगी। इसी कारण इस जनमत संग्रह के आयोजन का इस्लामी व्यवस्था की मज़बूती और ईरानी राष्ट्र की साम्राज्य विरोधी संघर्ष की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान व प्रभाव रहा है। इस जनमत संग्रह का एक महत्वपूर्ण प्रभाव, व्यवस्था के स्तंभों की मज़बूती है और यह चीज़ इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अमर हो गयी है। ईरान की इस्लामी व्यवस्था को स्थापित हुए लगभग चार दशक हो रहे हैं और जनता ने अपने भविष्य निर्धारण के लिए होने वाले विभिन्न चुनावों में भाग लेकर इस बात की पुनरावृत्ति की है।

इस आधार पर इस्लामी क्रांति के सफल होने के कुछ ही महीने बाद जनमत संग्रह कराये जाने को ईरानी इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन समझा जाना चाहिये और इसी चीज़ ने ईरान की इस्लामी क्रांति को विश्व की दूसरी क्रांतियों से अलग कर दिया है।

ईरान की इस्लामी क्रांति 37 वर्ष पहले सफल हुई और विश्व की समस्त क्रांतियों के विपरीत आज भी अपनी आकांक्षाओं व सिद्धांतों पर डटी हुई है। इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध और विस्तृत पैमाने पर प्रतिबंधों के बावजूद ईरान की इस्लामी क्रांति अपने मार्ग पर यथावत बाक़ी व अग्रसर है जबकि विश्व की दूसरी क्रांतियां समय बीतने के साथ- साथ अपने आरंभिक व मूल सिद्धांतों से हट गयीं।

विश्व की ज़ोर ज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों के मुकाबले में ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मैदान में इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की संभावना व क्षमता स्पष्ट हो गयी और विश्ववासियों के समक्ष यह स्पष्ट हो गया कि इस्लामी लोकतंत्र, नैतिक व धार्मिक मूल्यों के साथ अपने उद्देश्यों की दिशा में आगे बढ़ रहा है और वह अपनी आकांक्षाओं व उद्देश्यों से पीछे नहीं हटा है।

ईरानी जनता के क्रांतिकारी उद्देश्य व आकांक्षाएं वास्तव में इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिबिंम्बित हुई हैं। इन्हीं आकांक्षों के आधार पर ईरानी जनता शत्रुओं और उनके षडयंत्रों के मुकाबले में डटी हुई है और ईरानी जनता का प्रतिरोध शत्रुओं के अपने लक्ष्यों तक न पहुंचने का कारण बना है।

 

ईरान की इस्लामी व्यवस्था की आइडियालोजी हर प्रकार के वर्चस्व को नकारने और अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयास करने पर आधारित है। ईरान की इस्लामी व्यवस्था की यह आइडियालोजी विश्व की साम्राज्यवादी शक्तियों के क्रोध का कारण बनी है।

आज भी ईरान की इस्लामी व्यवस्था ईरानी जनता की इच्छा व राय पर भरोसा करके विशिष्टता प्राप्त करने पर आधारित शत्रुओं की मांग के मुकाबले में डटी हुई है ताकि वह इस्लामी क्रांति की आकांक्षाओं व ईरानी राष्ट्र की वैध मांगों की रक्षा कर सके। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस्लामी व्यवस्था की मज़बूती की सूचक है और वह स्वतंत्रता व आज़ादी चाहने वाले राष्ट्रों के मध्य आशा का कारण बनी है। इसी प्रकार वह ज़ोर -ज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों के मुकाबले में प्रतिरोध का कारण बनी है।

गत 37 वर्षों के कर्मपत्र पर दृष्टि इस वास्तविकता की सूचक है कि ईरान की इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था पूरे गौरव के साथ शत्रुओं के हर प्रकार के षडयंत्रों के मुकाबले में डटी रही।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरानी राष्ट्र के शत्रुओं ने इस क्रांति को ख़तरनाक दिखाने के लिए बहुत प्रयास किया और उसे अपनी कार्यसूचि में शामिल कर लिया। इस कार्य से उनका लक्ष्य ईरान की इस्लामी क्रांति की छवि को बिगाड़ना और उसे अलोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में पेश करना था। ईरान की इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था ने कूटनयिक मंच पर परमाणु विषय में शत्रुओं की धमकी को ईरानी राष्ट्र के अधिकारों को सिद्ध करने के अवसर में परिवर्तित कर दिया और इस बड़ी सफलता ने शत्रुओं के जटिल षडयंत्रों के मुकाबले में ईरान की राजनीतिक क्षमता को स्पष्ट कर दिया।

बहुत से समीक्षकों का मानना है कि इस्लामी गणतंत्र व्यस्था के शत्रुओं ने ईरान को अलग- थलग करने के लिए बहुत प्रयास किये परंतु वे क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में इस्लामी मूल्यों और ईरान की भूमिका व महत्व को कम न कर सके। परमाणु समझौता लागू हो जाने के बाद आर्थिक मंच पर ईरान अब बहुत से यूरोपीय और एशियाई देशों का पहला चयन बन गया है और यह समस्त सफलतायें वर्चस्वादियों और उनमें सर्वोपरि अमेरिका द्वारा उत्पन्न की जा रही बाधाओं के बावजूद मिली हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी ईरान ने इस समय ध्यान योग्य स्थान प्राप्त कर लिया है और ये सफलताएं भी प्रतिबंधों के काल में प्राप्त हुई हैं। ईरान स्टेम सेलन, परमाणु तकनीक, नाना प्रकार की परमाणु औषधियों के निर्माण और नैनो तकनीक जैसे विभिन्न क्षेत्रों में विश्व में ध्यान योग्य स्थान प्राप्त कर लिया है और उन देशों की सूचि में शामिल हो गया है जो इस ज्ञान व तकनीक से सम्पन्न हैं।

इस वर्ष भी ईरान की इस्लामी व्यवस्था की 38वीं बसंत का आरंभ ऐसी स्थिति में हो गया है जब ईरान सभी क्षेत्रों में शत्रुओं के समस्त षडयंत्रों के मुकाबले में पूरी शक्ति के साथ डटा हुआ है और इस मार्ग पर आगे बढ़ने चलने का दृढं संकल्प रखता है।

ईरान के शत्रुओं ने इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के समस्त वर्षों में सैनिक और आर्थिक मंच पर ईरानी जनता पर दबाव डालने का प्रयास किया परंतु इन दबावों से क्रांति के मूल्यों में कोई कमी नहीं आई और इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरानी राष्ट्र ने जो क़दम उठाया वास्तव में उसने शत्रुओं के समस्त षडयंत्रों पर पानी फेर दिया। शत्रुओं का ग़लत समीकरण ईरानी राष्ट्र से उनकी शत्रुता के वर्षों तक जारी रहने का कारण बना परंतु अंत में उनकी गतिविधियां ईरानी राष्ट्र के गौरव में वृद्धि का कारण बनीं यहां तक कि अब ईरानी राष्ट्र के दुश्मन भी इस वास्तविकता को स्वीकार कर रहे हैं। ईरान की इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था ने समस्त क्षेत्रों में अपने कार्यों से दर्शा दिया है कि अगर कोई राष्ट्र इज़्ज़त, प्रतिष्ठा, पहचान, सुरक्षा और अपने अधिकारों को प्राप्त करना चाहता है तो उसका मार्ग प्रतिरोध, परित्याग और आत्म विश्वास है। गत 37 वर्षों के दौरान इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के शत्रुओं ने विभिन्न प्रकार के षडयंत्र करके ईरानी जनता को निराश करने, ईरानी राष्ट्र की स्वतंता को आघात पहुंचाने और जनता को इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का नकार देने का प्रयास किया परंतु इन समस्त षडयंत्रों के बावजूद वे इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के स्तंभों को आघात न पहुंचा सके।

बहुत से समीक्षकों का मानना है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान हर समय से अधिक इस समय मज़बूत, शक्तिशाली और स्थिर हो गया और ईरान के शत्रु भी जो इससे पहले तक वास्तविकताओं को छिपाने और तोड़- मरोड़ कर पेश करने के प्रयास में थे, अब इस वास्तविकता को स्वीकार कर रहे हैं कि वास्तविकता को वे हमेशा नहीं छिपा सकते। इस आधार पर 12 फरवरदीन का दिन इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद केवल एक इतिहासिक उपलक्ष्य की याद नहीं दिलाता है बल्कि वह इस वास्तविकता का चिन्ह है कि आज इस्लामी क्रांति विकास और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर है और अपनी आकांक्षाओं व उद्देश्यों से तनिक भी पीछे नहीं हटी है और आज भी वह अपने इस्लामी व क्रांतिकारी मूल्यों के प्रति कटिबद्ध है।