ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-37
कालीन ऐसी वस्तु है जिसका चलन शताब्दियों से होता आ रहा है।
कुछ देशों में क़ालीन का प्रयोग केवल विशेष लोग या विशेष वर्ग ही करता है किंतु मध्यपूर्व विशेषकर ईरान में इसका प्रयोग सामान्य लोग करते हैं। जिस प्रकार से क़ालीन को ज़मीन पर बिछाने के लिए प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार क़ालीन से मिलती जुलती कुछ अन्य चीज़ें भी हैं जिन्हें ज़मीन पर बिछाते हैं जैसे चटाई, कंबल गलीचा या गेलीम आदि।
पिछले कार्यक्रम में हमने क़ालीन बुनने की कला के बारे में आपको विस्तार से बताया था। इस कार्यक्रम में हम गेलीम के बारे में चर्चा करेंगे। गेलीम एक प्रकार का छोटा क़ालीन होता है जिसे बिछाने के काम में लाते हैं। इसको भेड़ के ऊन या धागों से बनाया जाता है। सामान्यतः इसे ज़मीन को ठकने के लिए प्रयोग करते हैं किंतु जानवरों की पीठ पर ज़ीन के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। कहते हैं कि ज़मीन पर बिछाने वाली चीज़ों में गेलीम एक एसी चीज़ है जिसका प्रयोग शताब्दियों से होता आया है।
इसको बुनने के काम का इतिहास लगभग छह हज़ार वर्ष पुराना है। कहते हैं कि आरंभिक काल का मानव इसका प्रयोग किया करता था। इस बात के एतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं कि प्राचीन ईरान में गेलीम का प्रयोग हुआ करता था जो अब भी प्रचलित है। प्राचीन काल में जो गेलीम या गलीचा बनाया जाता था वह बहुत सादा होता था और उसका रंग वैसा ही होता था जिस वस्तु से वह बनाया जाता था। बाद में इसे रंगा जाने लगा और अब तो वह नाना प्रकार के रंगों में मौजूद है। वर्तमान समय में जिन क्षेत्रों में बंजारे रहते हैं वहां पर अब भी प्राक्रतिक रंगों के गेलीम पाए जाते हैं। यह रंग सामान्यतः प्रकृति से प्रभावित होते हैं क्योंकि बंजारे अपना जीवन खुले प्रकृतिक स्थलों में ही व्यतीत करते हैं।

मिस्र में फ़िरऔन के काल से संबन्धित प्रमाणों से पता चलता है कि उस काल में भी गेलीम का प्रयोग किया जाता था। विश्व के सबसे प्राचीन गेलीम का संबन्ध छह हज़ार वर्ष ईसापूर्व से है। ईरान के सबसे पुराने गेलीम का संबन्ध तीन हज़ार वर्ष ईसापूर्व से है। यह ईरान के पश्चिम में मिला है। यह गेलीम बहुत ही सादा है जिसे सादे धागों से बना गया था। प्राचीनकाल में गेलीम को ज़मीन पर बिछाने के उद्देश्य से प्रयोग किया करते थे जबकि कहीं कहीं पर इसे ज़मीन पर बिछाने के साथ ही चादर की भांति ओढ़ने के लिए भी प्रयोग किय जाता था। इस समय भी अफ़ग़ानिस्तान के कुछ क़बाएली क्षेत्रों में गेलीम को बिछाने और ओढ़ने दोनो उद्देश्यों से प्रयोग किया जाता है। यह सामान्यतः ऊनी होता है उसका इसका प्रयोग जाड़े के मौसम में किया जाता है। जब विश्राम करना होता है तो इसे ज़मीन पर बिछा लेते हैं और जब ठंड लगती है तो इसे ओढ़ने के लिए प्रयोग करते हैं।
जैसाकि हमने आपको बताया कि गेलीम का इतिहास बहुत पुराना है और यह क़ालीन की तुलना में अधिक प्राचीन है किंतु बुनाई के हिसाब से गेलीम को सरलता से बुना जाता है। क़ालीन के मुक़ाबले में गेलीम सस्ता भी होता है। गेलीम की बुनाई में ईरान के बंजारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे लोग बड़ी मेहनत से बहुत ही सुन्दर गेलीम बुनते हैं। बहुत से जानकारों का कहना है कि किसी गेलीम की बुनाई को देखकर उस क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिति और वहां के लोगों की परंपराओं का पता सरलता से लगाया जा सकता है।
कहते हैं कि कपड़ा बुनने की कला से पहले ही गेलीम बुनने की कला प्रचलित हो चुकी थी। इस बात की संभावना जताई गई है कि गेलीम और कपड़े की बुनाई की कला को टोकरी की बुनाई की कला से प्राप्त किया गया है। गेलीम कई प्रकार की होती है जैसे सूती धागे से बनी, ऊन से बनी और रूई से बनी आदि।
पारंपरिक गेलीम में जो रंग प्रयोग किये जाते हैं वे वनस्पति वाले रंग होते हैं। कभी कभी गेलीम को सुन्दर और अच्छा दर्शाने के लिए उसको चाय के रंग या अख़रोट की छाल से धोया जाता है। गेलीम के सामान्यतः विभिन्न साइज़ होते हैं और यह सदवै आयाताकार होती है।

गेलीम और क़ालीन में मूल अंतर यह है कि इसको बुनने वाला अपनी प्रतिभा और अपने लगाव के हिसाब से बनाता है और इसके लिए पहले से कोई योजना नहीं बनाई जाती। गेलीम को सामान्यतः ज्योमिति आकार में बनाया जाता है। इसको बुनने वाला कभी कभी इसपर जानवरों के चित्र भी उकेरता है जो पालतू भी हो सकते हैं और जंगली भी।
इस समय गेलीम को बुनने में जिस शैली को भुला दिया गया है किंतु पुरानी गेलीम और क़ालीनों में जिसे स्पष्ट रूस से देखा जा सकता है वह भेड़ के बालों का प्रयोग है। भेड़ के बालों की मुख्य विशेषता यह है कि वह वॉटरप्रूफ़ होता है। इस प्रकार चींटियां और मच्छर भी इसमें घुस नहीं पाते। गेलीम को विभिन्न प्रकार से बुना जाता है और सामान्यतः इसके बुनने से पहले इसके लिए कोई डिज़ाइन नहीं बनाई जाती।
ईरान के पश्चिमोत्तरी क्षेत्रों में जो गेलीम बुनी जाती है उसे वेरनी कहते हैं जिसे इन क्षेत्रों के लड़कियां और महिलाएं बुनती हैं। इसी प्रकार कुर्दिस्तान और केरमान में भी एक अन्य प्रकार से गेलीम बुनने का चलन है जिनको केरमान में “शीरीकी” पीच कहा जाता है। कहते हैं कि ईरान की सबसे अच्छी गेलीम, शाहसवन या सवन क़बीले की महिलाएं बुनती हैं। इनका इतिहास भी बहुत पुराना है और अब वेरनी शब्द का जब भी प्रयोग होता है तो उसीके साथ शाहसवन का नाम भी दिमाग़ में आता है। वास्तव में शाहसवन, आज़रबाइजान के एक क़बीले का नाम है। यह लोग पश्चिमोत्तरी ईरान में रहते हैं।
शाहसवन क़बीले के हाथों बुनी जाने वाली गेलीम को स्थानीय भाषा में वेरनी कहते हैं। इसको ज्योमितीय आकार में हल्के रंग में बुना जाता है। कहा जाता है कि इस गेलीम जैसी गेलीम किसी अन्य स्थान पर नहीं बन सकती। वेरनी नामक गेलीम का, फ़ार्स की खाड़ी के देशों के अतिरिक्त योरोपीय देशों में भी निर्यात किया जाता है।
यह गेलीम सफेद, सुरमई, नीली और प्याज़ के रंग की होती है। इसको ज़मीन पर बिछाने के अतिरिक्त घोड़ों की पीठ पर ज़ीन के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। ईरान की लुर जाति भी बहुत सुन्दर गेलीम बनाती है। यह भी विभिन्न रंगों की होती है जिनपर विशेष प्रकार के चित्रों को उकेरा जाता है। यहां पर हरसीन नामक गेलीम बनाई जाती है जो कई रंगों की होती है।

ईरान की सुन्दर गेलीम में बलोचों द्वारा बनाई जाने वाली गेलीम को भी ख्याति प्राप्त है। इसको सीस्तान व बलोचिस्तान में बनाया जाता है। बलोच लोग सामान्यतः प्रकृति के बहुत निकट है अर्थात वे साधारण जीवन व्यतीत करते हैं और बहुत मेहनती होते हैं। उनके गेलीम को देखकर एसा लगता है कि वे हरियाली को अधिक पसंद करते हैं। बलोचों के गेलीम में अधिक तेज़ रंगों का प्रयोग किया जाता है और इनके डिज़ाइन अलग अलग होते हैं। इसके अतिरिक्त ईरान में गेलीमे ख़म्से, गेलीमे सने, गेलीमें क़शक़ाई, गेलीमे ज़रंद और गेलीमे तुर्कमन नामके गेलीमें पाई जाती हैं जिनमें से प्रत्येक के बनाने की शैली अलग अलग है और उसके रंग भी भिन्न हैं।
गेलीम बनाने वाले प्रांतों में एक अर्दबील भी है। वहां की बनी गेलीमें पूरी दुनिया में मश्हूर हैं। इनकी देश के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर भारी मांग है। ईरान के विभिन्न प्रांतों में जो गेलीम बुनी जाती हैं उनमें कहीं पर आरंभ में कुछ वस्तुओं के चित्र होते हैं जबकि उसके किनारे पर अजगर बना होता है। अर्दबील के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में गेलीम की बुनाई का काम होता है किंतु वहां के अंबरान गांव में बुनी जाने वाली गेलीम की मांग पूरे प्रांत में ही नहीं बल्कि अन्य स्थानों पर भी है।