Feb १९, २०१९ १४:०३ Asia/Kolkata

जिस तरह महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में रवायतें आयी हैं और महान हस्तियों ने सूचना दी है उतनी किसी भी इमाम या मासूम के बारे में रवायतें नहीं आयी हैं।

महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में जो रवायतें आई हैं उनमें बहुत सी चीज़ों के बारे में ध्यान योग्य समानता मौजूद है। जैसे इमाम के पैदा होने, उनके चेहरे की विशेषता, ग़ैबते सोग़रा व कुबरा का काल आदि।

ग़ैबते सोग़रा उस काल को कहते हैं जब इमाम 40 वर्षों के लिए लोगों की नज़रों से ओझल हुए थे और उनके विशेष प्रतिनिधियों के माध्यम से लोग इमाम से संपर्क करते थे और ग़ैबते कुबरा उस काल को कहते हैं जब इमाम का कोई विशेष प्रतिनिधि नहीं है और वे लोगों की नज़रों से ओझल हैं।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में फरमाते हैं" मेरे और मेरे बेटे हसन के बाद उसका बेटा वही क़ायेम होगा जिसके न्याय से पूरा विश्व भर जायेगा"

 

जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबत का काल यानी नज़रों से ओझल होने का समय लोगों के ईमान की परीक्षा का समय है। राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उतार -चढ़ाव, युद्ध, हिंसा और दिन प्रतिदिन बढ़ता अन्याय और भेदभाव एक ओर और दूसरी ओर महामुक्तिदाता की ग़ैबत के काल के लंबा होने की वजह से बहुत से लोग अपने ईमान में असमंजस का शिकार हो जायेंगे और केवल कुछ ही लोग अपने ईमान में विचलित नहीं होंगे। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने एक भाषण में इस संबंध में फरमाते हैं" जान लो कि मेरे बेटे की ग़ैबत इतनी लंबी होगी कि लोग असमंजस में पड़ जायेंगे किन्तु वे लोग असमंजस व संदेह में नहीं पड़ेंगे जिनके ईमान की रक्षा ईश्वर करेगा"

महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम जब प्रकट होंगे तो इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के कथनानुसार वे काबे की दीवार से टेक लगाकर खड़े होंगे और लोगों को आवाज़ देंगे कि हे लोगो होशियार हो जाओ जो आदम और शीश के चेहरे को देखना चाहता है यह मैं हूं वही आदम और शीश नबी, होशियार हो जाओ जो नूह और उनके बेटे के चेहरे को देखना चाहता है मैं वही नूह और साम हूं। होशियार हो जाओ जो हज़रत इब्राहीम और इस्माईल के चेहरे को देखना चाहता है मैं वही इब्राहीम और इस्माईल हूं। होशियार हो जाओ जो हज़रत मूसा और यूशा को देखना चाहता है मैं वही मूसा और यूशा हूं। होशियार हो जाओ जो हज़रत मोहम्मद और हज़रत अली को देखना चाहता है तो मैं वही मोहम्मद और अली हूं। होशियार हो जाओ जो इमाम हसन और इमाम हुसैन को देखना चाहता है मैं वही इमाम हसन और इमाम हुसैन हूं। होशियार हो जाये जो इमाम हुसैन के वंश से इमामों को देखना चाहता है तो मैं वही इमामों का चेहरा हूं तो मेरे निमंत्रण का जवाब दो क्योंकि अब तक जो सुने हो या नहीं सुने हो उसके बारे में मेरे पास सूचना है और जो भी आसमानी किताबों को पढ़ता है उसे चाहिये कि वह मेरी बातों को सुने।"

उसके बाद इमाम महदी अलैहिस्सलाम लेशमात्र कमी के बिना पैग़म्बरों पर जो किताबें नाज़िल हुई हैं उसे पढ़ेंगे और उसके पश्चात वे पवित्र कुरआन की कुछ आयतों की तिलावत करेंगे उस वक्त पवित्र कुरआन के जानकार कहेंगे कि ईश्वर की सौगन्ध यह वही कुरआन है जो पैग़म्बर पर नाज़िल हुआ था यहां तक कि एक अक्षर न तो कम हुआ है न उसका स्थान परिवर्तित हुआ है और उसमें किसी प्रकार का फेर बदल नहीं हुआ है।

इस रवायत में एक बहुत महत्वपूर्ण और बुनियादी बिन्दु यह है कि अगर इमाम महदी अलैहिस्सलाम पैग़म्बरों और इमामों के उत्तराधिकारी हैं तो ग़ैबते सुग़रा और कुबरा में उनके ईश्वरीय दायित्व का निर्वाह कैसे होगा और इमाम किस प्रकार अपना दायित्व निभायेंगे? इस सवाल के जवाब में कहना चाहिये कि समस्त ईश्वरीय दूतों, पैग़म्बरों और इमामों के उद्देश्यों को व्यवहारिक बनाने के लिए इमाम को सीधे रूप से समाज में मौजूद होना चाहिये और समाज के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी अपने हाथ में लेनी चाहिये परंतु इस संबंध में कटु अनुभव यह है कि इससे पहले के इमामों को अमवी और अब्बासी शासकों ने शहीद कर दिया और अब भी इमाम के शहीद किये जाने की संभावना मौजूद है और इमाम के शहीद कर दिये जाने की स्थिति में सत्य के मोर्चे को सदैव के लिए विफलता का सामना होगा और सत्य के प्रचार- प्रसार के लिए ईश्वरीय दूतों और पैग़म्बरों ने जो प्रयास किये हैं सब बेकार हो जायेगा। इस आधार पर महान ईश्वर की इच्छा से महामुक्तिदाता इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम जीवित और पर्दये ग़ैब यानी लोगों की नज़रों से ओझल हैं और दुश्मन उन्हें किसी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते और सूरज जिस तरह बादलों के पीछे रहकर भी दुनिया को लाभ पहुंचाता है उसी तरह महामुक्तिदाता भी पर्दये ग़ैब में रहकर समाज का पथप्रदर्शन करें और समाज को दिग्भम्रित होने से बचायें और इस कार्य को महामुक्तिदाता ने ग़ैबते सुग़रा में चालिस वर्षों तक अपने चार विशेष प्रतिनिधियों के माध्यम से अंजाम दिया। यह चारों विशेष प्रतिनिधि महामुक्तिदाता और लोगों के मध्य संपर्क पुल की भांति थे। इन चारों विशेष प्रतिनिधियों के नाम इस प्रकार हैं उसमान बिन सईद अम्री, मोहम्मद बिन उसमान बिन सईद अम्री, हुसैन बिन रूह नौ बख्ती और अली बिन मोहम्मद समरी। जब यह लोग ज़िन्दा थे तो महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम से सीधे संपर्क में थे और लोगों की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आदि समस्त समस्याओं को इमाम के सामने पेश करते थे और उनका जवाब लोगों तक पहुंचाते थे किन्तु इसके बाद नई परिस्थितियां सामने आयीं और इस संपर्क का जारी रहना भी संभव नहीं रहा तो विवशतः ग़ैबते सुग़रा का काल आरंभ हो गया और यह वह काल है जिसकी तुलना किसी प्रकार से ग़ैबते सुग़रा के काल से नहीं की जा सकती। इसी कारण यह सवाल मस्तिष्क में आता है कि इस काल में मानव समाज विशेषकर इस्लामी समाज की क्या ज़िम्मेदारी है? इस संबंध में महामुक्तिदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” हर ज़माने में जो घटनायें पेश आयेंगी उनमें उन लोगों से संपर्क करो जो हमारी रवायतों के जानकार हैं वे तुम्हारे बीच हमारे प्रतिनिधि हैं और हम उन पर ईश्वर के प्रतिनिधि हैं” महामुक्तिदाता के प्रतिनिधि के बारे में जो रवायतें आयी हैं वे व्यापक हैं और किसी व्यक्ति विशेष से विशेष नहीं हैं। अतः ग़ैबते कुबरा के काल में अपने दायित्वों को जानने के लिए हमें उन लोगों से संपर्क करना चाहिये जो इस्लाम धर्म का व्यापक व गहरी जानकारी रखते हैं और हमें उनके फतवों पर अमल करना चाहिये। यानी जिस तरह से हम समस्त मामलों में विशेषज्ञों से संपर्क करते हैं और उनके फैसलों पर अमल करते हैं उसी तरह हमें उस धर्मविशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिये जिसके अंदर वे शर्तें मौजूद हों जिनका उल्लेख रवायतों में किया गया है।

 

एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह  है कि रवायत में यह जो नई घटनाओं के शब्द का प्रयोग किया गया है उससे तात्पर्य क्या है? क्या इससे तात्पर्य केवल धार्मिक मामले हैं? या फिर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक मामले भी इसमें शामिल  हैं? ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इस संबंध में कहते हैं” अगर इससे तात्पर्य केवल धार्मिक मामले होते तो पैग़म्बरे इस्लाम एक पुस्तिका संकलित कर देते और सब निश्चिंत हो जाते जबकि ऐसा नहीं है बल्कि उससे तात्पर्य राजनीतिक, सामाजिक और दिनचर्या की घटनाएं भी हैं जो दुनिया में होती- रहती हैं।

अलबत्ता कुछ धर्म शास्त्रियों का मानना है कि नई घटनाओं से तात्पर्य केवल धार्मिक घटनाएं हैं और वे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं आदि को इसमें शामिल नहीं करते हैं और इस प्रकार अमल करते हैं कि मानो इस समय दुनिया में जो घटनायें घट रही हैं उसके संबंध में उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इस विचारधारा को नकराते हुए अपने एतिहासिक संदेश में कहते हैं” समय और स्थान दो चीजें हैं जो इजतेहाद में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। क़ुरआन, हदीस और बुद्धि का प्रयोग करके और धर्मगुरूओं के एकमत होने को ध्यान में रखकर धार्मिक नियम समझने को इजतेहाद कहते हैं। वह कहते हैं” पुराने ज़माने में एक चीज का एक धार्मिक आदेश था परंतु हालात और परिस्थितियों के दृष्टिगत उसी चीज़ का दूसरा व नया आदेश हो सकता है। तो मुजतहिद  को समय का बोध होना चाहिये। एक मुजतहिद के अंदर एक समाज के मार्गदर्शन की क्षमता होनी चाहिये। इसके अलावा उसके अंदर निष्ठा और तकवा अर्थात ईश्वरीय भय आदि दूसरी विशेषताएं होनी चाहिये। मुजतहिद को वास्तव में प्रबंधक और युक्तिवाला होना चाहिये। वास्तविक मुजतहिद की नज़र में सरकार धर्मशास्त्र के समस्त पहलुओं के व्यवहारिक होने का माध्यम है यानी सरकार के माध्यम से ही धर्मशास्त्र के समस्त मानवीय पहलुओं को व्यवहारिक बनाया जा सकता है। धर्मशास्त्र पालने से लेकर कब्र तक मानव समाज को संचालित करने की पूर्ण व वास्तविक थ्योरी है।“

स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने इस प्रकार के दृष्टिकोण के साथ ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले विलायते फ़कीह़ अर्थात धर्मशास्त्री की सरकार का मामला पेश किया और इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अपने मार्गदर्शन काल में अपनी विचारधारा को उन्होंने  व्यवहारिक बनाया।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस समय दुनिया में विलायते फक़ीह के संबंध में जो संदेह पैदा किये जा रहे हैं उन सबकी वजह यही है कि समय का बोध रखने वाला धर्मशास्त्री सर्वोपरि होता है और उसके आदेश का पालन सब पर ज़रूरी होता है।  

ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी अपने संदेश के एक अन्य भाग में लिखते हैं” जब तक धर्मशास्त्र किताबों और विद्वानों के सीनों में रहेगा तब तक विश्व की लूटखसोट करने वालों को उससे कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और धर्मगुरू जब तक समस्त समस्याओं में मौजूद न हों तब तक वे समझ ही नहीं सकते कि इजतेहाद का जो रूप प्रचलित है वह समाज के संचालन के लिए पर्याप्त नहीं है। धार्मिक शिक्षा केन्दों और धर्मगुरूओं को चाहिये कि समाज के भविष्य की ज़रूरतों पर नज़र रखें और हमेशा घटनाओं के संबंध में दो क़दम आगे बढ़कर उचित प्रतिक्रिया दिखायें। हो सकता है कि लोगों के मामलों के संचालन के लिए जो शैली प्रचलित है वह बदल जाये और मानव समाज को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए नई आवश्यकताओं का सामना हो। इस्लाम के बड़े धर्मगुरूओं को अभी से इस विषय पर विचार करना चाहिये।

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