ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-34
ईरान के क़ालीन के बारे में हज़ारों किताबें और लेख लिखे गए हैं और बहुत से कला विशेषज्ञ ईरान के बेहतरीन ढंग से बुने गए अच्छे डिज़ाइनों वाले क़ालीनों को उद्योग व कला का शाहकार और ईरान में हस्तकला का बेजोड़ नमूना मानते हैं।
हर ईरानी क़ालीन की तैयारी में कई महत्वपूर्ण कारक एक दूसरे का साथ देते हैं और उनके बीच एकता व समन्वय ही क़ालीन की सुंदरता और उसके कलात्मक मूल्य में वृद्धि का कारण बनता है। ये कारक हैं, रंगरेज़ी, डिज़ाइन, पृष्ठभूमि और बुनाई।
स्पष्ट है कि एक क़ालीन की तैयारी में, क़ालीन बुनने वाले एक एक क़दम आगे बढ़ते हैं। क़ालीन का सबसे अहम व मुख्य कच्चा माल, भेढ़ का ऊन या बकरी के गर्दन व पेट के नीचे का बाल है जिससे नाज़ुक क़ालीन तैयार किए जाते हैं। अलबत्ता क़ालीन के मुख्य ढांचे के लिए धागा ही इस्तेमाल किया जाता है। क़ालीन की तैयारी में ऊन के अलावा रेशम और सुनहरा व रुपहला गुलाबतून भी प्रयोग होता है। गुलाबतून बड़े नाज़ुक व बारीक तारों को कहते हैं जिनके भीतर रेशम का धागा होता है और उसके ऊपर सोने का पानी चढ़ाया जाता है।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस काम के लिए ज़िंदा भेड़ के शरीर से लिया गया ऊन सबसे अच्छा होता है क्योंकि क़ालीन के बुनकरों का मानना है कि उस पर बेहतर ढंग से रंग चढ़ता है और चमक आती है। यही कारण है कि ऊन की रंगाई के समय वे जीवित भेड़ से लिए गए ऊन को खिले हुए रंग विशेष कर लाल रंग में रंगते हैं जबकि ज़िबह की गई भेड़ों के ऊन को गहरे नीले जैसे रंगों के लिए प्रयोग किय जाता है। अगर भेड़ें हरी-भरी चरागाहों में चरती हैं और पहाड़ों व पर्वतांचलों की सुगंधित घासें व पौधे खाती हैं तो उनका ऊन अधिक महंगा होता है। उदाहरण स्वरूप अलवंद पहाड़ के आंचल की चरागाहों में चरने वाली और मुलैठी व अजवाइन जैसे पौधे खाने वाली भेड़ों का ऊन अधिक मूल्यवान होता है और इस प्रकार के ऊन से बुने गए क़ालीनों में एक विशेष चमक होती है।
ऊन को धोने और साफ़ करने का चरण भी क़ालीन की तैयारी में एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। क़ालीन बुनने वाले प्राचीन कलाकारों का मानना था कि ऊन और बकरियों के बाल को सोते के साफ़, मीठे और ठंडे पानी में धोया जाना चाहिए।
सब्बाग़ी, अर्थात रंगरेज़ी या रंगाई उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके अंतर्गत धागों, अनसिले कपड़ों या वस्त्रों को ऐसे घोल में डाल कर रंग किया जाता है जिसमें रंगने वाले व रासायनिक पदार्थ पड़े होते हैं। इस प्रक्रिया में रंग के अणु, कपड़ों व धागों के अणुओं से ठोस संबंध स्थापित कर लेते हैं। ईरान में रंगाई का काम काफ़ी प्राचीन इतिहास रखता है। यूनान के इतिहासकार गेज़नफ़ोन ने चार सौ वर्ष इसी पूर्व अर्थात आज से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व सार्द शहर में हख़ामनेशी शासकों के क़ालीन बुनने के केंद्र की ओर संकेत किया और नीलमी रंग के एक क़ालीन के बारे में लिखा है जिसे कूरूश या साइरस की क़ब्र पर बिछाया गया था। यह बात निश्चित है कि ईरान के प्राचीन इतिहास के आरंभ से ही इस देश में क़ालीन की बुनाई और रंगरेज़ी की कला, एक अहम व परिपूर्ण कला के रूप में मौजूद थी। पाज़ीरीक नामक क़ालीन के किनारों पर बड़ी संख्या में घोड़े दिखाई देते हैं और उसकी बुनाई में हरे, नीले, लाल व पीले रंगों का प्रयोग किया गया है। इसके डिज़ाइन, चित्रों और बुनाई की शैली की समीक्षा से पता चलता है कि इस प्रकार की जटिल कला को अस्तित्व में आने के लिए कम से कम एक सहस्त्राब्दी की परम्परा ज़रूरी है।
सासानी काल के मिले हुए कुछ कपड़े, जो डिज़ाइनिंग और रंगाई की कला के उत्तम नमूने हैं, उस काल में रंगाई, कपड़ा उद्योग और क़ालीन की बुनाई के विकसित उद्योग का चिन्ह समझे जाते हैं। सासानी काल के क़ालीनों के नमूनों में से एक बहारिस्तान या बहारे ख़ुसरो है जिसमें अद्वितीय पत्थरों व अत्यंत मूल्यवान धातुओं के प्रयोग के अतिरिक्त पूरे साल के सभी मौसमों के रंगों को आश्चर्यजनक ढंग से इस्तेमाल किया गया है और उसे देखने वाला हर आदमी हतप्रभ रह जाता है।
इस्लाम आने के बाद आले बूये और फिर सलजूक़ियों के काल में यज़्द, काशान और इस्फ़हान सहित ईरान के बहुत से शहरों में रंगाई के केंद्र औद्योगिक स्तर पर बनाए गए जिनमें बुनकरों के साथ ही रंगरेज़ भी सदैव उपस्थित रहते थे और नए नए रंग तैयार करने के संबंध में अपने अनुभव व दक्षता से लाभ उठाते थे। सलजूक़ी काल में पौधों के इस्तेमाल और रंगाई के दक्ष उस्तादों की सहायता से क़ालीनों के रंग इस हद व व्यापकता को पहुंच गए थे कि धीरे धीरे उन्होंने अन्य कलाओं और हस्त उद्योगों पर वर्चस्व स्थापित कर लिया। ईरान के रंगरेज़ कलाकारों के हाथों मजीठ, केसर, अख़रोट व अनार की छाल व छिलके और अन्य पौधों से रंगों की तैयारी ने इतनी प्रगति की कि दुनिया के किसी भी स्थान पर उसका उदाहरण नहीं खोजा जा सकता।
सफ़वी काल, ईरान में रंगाई और क़ालीन की बुनाई के उद्योगों की प्रगति का चरम बिंदु है और इस काल की अनेक कलाकृतियां अब भी सुरक्षित हैं जो पूरे विश्व के विभिन्न संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। इन कलाकृतियों में रंगाई की बेजोड़ कला देखी जा सकती है जिनमें हर प्रकार के रंग मौजूद हैं। उस काल में रंगरेज़ अपनी सृजन शक्ति की सहायता से हर रंग से मिलते जुलते कुछ रंग बना लेते थे जो वास्तविक रंग से बहुत कम भिन्न होते थे। उदाहरण स्वरूप वे लाल और बैंगनी रंग के समावेश से ऐसा रंग बनाते थे जिसे बंलैक बैरी के रंग में रंगने के लिए प्रयोग किया जाता था।
इन मूल्यवान कलाकृतियों और इसी प्रकार लिखित दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ईरान में क़ालीन के बुनकर अधिकतर वनस्पति व प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया करते थे। वे प्राकृतिक रंगों की स्थिरता को क़ालीनों के अधिक समय तक बाक़ी रहने और उनके मूल्य में वृद्धि का कारण मानते थे। रासायनिक रंगों के उद्योग के चरम सीमा पर पहुंच जाने के बावजूद अब भी ईरान में क़ालीनों का काम करने वालों का इसी बात पर विश्वास है। उनका मानना है कि यद्यपि रासायनिक रंग विविधता की दृष्टि से, प्राकृतिक रंगों से आगे निकल चुके हैं, कभी कभी उनकी स्थिरता भी अधिक होती है और उन्हें प्रयोग करना काफ़ी आसान होता है लेकिन वनस्पति व प्राकृतिक रंगों की बात ही कुछ और है।
ईरान में क़ालीन बुनने वाले लोग, रंगाई की प्राचीन परम्परा को आसानी से छोड़ने वाले नहीं हैं और उनके पास इस परम्परा के पालन के ठोस तर्क भी हैं। वे कहते हैं कि वनस्पति व प्राकृतिक रंगों की चमक, मौलिकता, सामंजस्य और गर्मी कोई भी रासायनिक व कृत्रिम रंग पैदा नहीं कर सकता। इसी प्रकार समय बीतने के साथ साथ प्राकृतिक रंग अधिक पक्के व संपूर्ण होते हैं और इसी लिए ईरान का क़ालीन जितना अधिक पुराना होता जाता है, उसका मूल्य बढ़ता जाता है और उसके स्तर में किसी प्रकार की कमी नहीं आती जबकि रासायनिक रंग, समय बीतने के साथ साथ अपना स्तर खो देते हैं और क़ालीन का मूल्य कम कर देते हैं।
क़ालीनों की रंगाई के लिए पौधों व वनस्पतियों से लाभ उठाने से लोग हज़ारों साल पहले अवगत थे। यह प्राचीन कार्य बिना किसी परिवर्तन के 19वीं शताब्दी के मध्य तक जारी रहा। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि रंगरेज़ी की कला पहली बार सुदूर पूर्व में विकसित हुई और वर्ष 1528 इसी पूर्व में अस्तित्व में आई है। इसी प्रकार ऐसे प्रमाण भी हैं कि रंगरेज़ी की कला काफ़ी प्राचीन समय में भारत में शुरू हुई थी। वीनस के प्रख्यात सैलानी मारकोपोलो ने अपने यात्रा वृत्तांत में बताया है कि किस प्रकार एशिया में नीला रंग तैयार किया जाता था और बाद में पुर्तगाल वाले वह कला यूरोप लेकर आए और इस कला को विकसित किया गया।
प्राकृतिक रंग, जैसा कि उनके नाम से ही स्पष्ट है, प्रकृति से प्राप्त होते हैं और वास्तव में ये अतीत के लम्बे बरसों और शताब्दियों के दौरान विभिन्न लोगों की इच्छाओं को प्रतिबिंबित करते हैं। ये रंग, पौधों, फलों के छिलकों व छालों और वनस्पतियों की जड़ों से प्राप्त होते हैं। उदाहरण स्वरूप भूरा रंग, अख़रोट व अनार के छिलके से, पीला रंग, अंगूर व शहतूत के पत्ते से, हरा रंग स्पर्ग नामक एक विशेष प्रकार के सुगंधित पौधे से, काला रंग वर्क नामक एक कांटेदार झाड़ी के दाने व पत्ते से और लाल रंग, मजीठ से तैयार किया जाता है।
विभिन्न रंगों को हल्का करने के लिए उसे दूसरे रंगों में मिश्रित किया जाता है। जैसे कि सुनहरी पीले रंग को नारंजी पीले रंग में बदलना चाहें तो पहले स्पर्ग और फिर मजीठ के पानी का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा अगर भेड़ का ऊन एक ही रंग का हो तो उसे भी प्राककृतिक रंग के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह ऊन प्राकृतिक सफ़ेद, क्रीम रंग, भूरे या काले रंग के रूप में प्रयोग हो सकता है अलबत्ता अधिक निश्चिंत होने और अधिक चमक के लिए बेहतर है कि ऊन को रंग लिया जाए।
प्राकृतिक रंगों की तैयारी के लिए कला के साथ ही साथ प्रकृति की पहचान और वनस्पति शास्त्र में दक्षता भी ज़रूरी है क्योंकि क़ालीन की रंगाई में बहुत सारी बातें प्रभावी होती हैं और उसी अनुपात में क़ालीन का मूल्य निर्धारित होता है। उदाहरण स्वरूप वनस्पतियों की विविधता के दृष्टिगत अगर एक पौधे को एक ही स्थान से लेकिन अलग-अलग समय में एकत्रित किया जाए तो मौसम के परिवर्तन के कारण उसके रंगों में भी विविधता होती है। यही कारण है कि प्राकृतिक रंगों से तैयार किए गए क़ालीनों का मूल्य, रासायनिक और ग़ैर प्राकृतिक रंगों और धागों से बुने गए क़ालीनों से कहीं अधिक होता है।