नया सवेरा- 7 (फ़ातेमा ग्रैहम)
आज हम ब्रिटेन की रहने वाली फ़ातेमा ग्रैहम के बारे में चर्चा करेंगे जो ताज़ा मुसलमान हुई हैं।
जो लोग मुसलमान होते हैं वे सामान्यत: पवित्र क़ुरआन और इस्लामी किताबों का अध्ययन बरते हैं या फिर मुसलमानों और मुस्लिम धर्मगुरूओं से इस्लाम के बारे में सवाल करते हैं।
फ़ातेमा ग्रैहम का जन्म ब्रिटेन में हुआ। उनके पति भी अब मुसलमान हो चुके हैं और दोनों स्काटलैण्ड में जीवन गुज़ार रहे हैं।
फ़ातेमा ग्रैहम का कहना है कि मैंने इस्लाम कत रोज़े से पहचाना। इस बारे में वे कहती हैं कि एक बार मैं अपनी मुसलमान सहेली से मिलने उसके घर गई। दोपहर का समय था। सामान्यत: इस समय लोग दोपहर का खाना खाते हैं। जब मैं अपनी मुसलमान सहेली के घर पहुंची तो देखा कि काफ़ी समय गुज़रने के बावजूद उसके घर में किसी ने भी दोपहर का खाना नहीं खाया।
यह बात मेरे लिए बहुत विचित्र थी । जब मुझको बात करते तो मैंने उससे पूछा कि क्या तुम दोपहर में खानी नहीं खातीं? इसपर मेरी सहेली ने कहां नहीं तो हम दोपहर में भी खाना खाते हैं।
अपनी सहेली का जवाब सुनकर मैंने कहा कि फिर तुम क्यों आज दोपहर में खाना खा रही हो? इसके जवाब में उसने बताया कि हम लोगों का रोज़ा है। उस समय तक मुझको रोज़े के बारे में कुछ भी पता नहीं था। मैंने अपनी सहेली से कहा कि मुझको रोज़े के बारे में बताओ। इसपर उसने मुझको रोज़े के बारे में विस्तार से बताया। उसकी बातों को सुनकर मैंने सोंचा कि रोज़ा तो हम इसाइयों के यहां भी है किंतु मुसलमानों को रोज़े से वह बहुत भिन्न है। फ़ातेमा ग्रैहम ने कहा कि जब मुझको मुसलमानों के रोज़े के बारे में पता चला, तो मैंने जाना कि हमारे रोज़े की तुलना में मुसलमानों के रोज़े में अधिक बलिदान और अधिक इच्छा शक्ति की ज़रूरत होत हैं कि चलते समय मेरी सहेली ने मुझको उपहार में क़ुरआन दिया।
फ़ातेमा ग्रैहम कहती हैं कि इस्लाम का व्यापक अध्ययन करने के बाद मैं एक मुसलमान धर्मगुरू के घरपर कलमा पढ़कर मुसलमान हो गई। वे इस्लाम को सकारात्मक विशेषताओं वाला धर्म बताती हैं।
जिस प्रकार से इस्लाम के उपासना संबन्धी नियमों का पालन करना चाहिए उसी प्रकार से हमें उसके गहरे तर्क को भी समझना चाहिए। फ़ातेमा ग्रैहम कहती हैं कि इस्लामी शिक्षाओं के विदित रूप और उसके निहित रूप में से किसी को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता ।
फ़ातेमा ग्रैहम कहती हैं कि वे लोग जो मुसलमान होते हैं उनके सामने मुसलमान होने के बाद एक बहुत ही महत्वपूर्ण चुनौती आती है। वे कहती हैं कि इस मुसलमान को यह पता नहीं होता कि वह अब किस मुस्लिम पंथ को अपनाएं अर्थात हनफ़ी, मालेकी, शाफ़ेई , हंबली या फिर जाफ़री को।
फ़ातेमा ग्रैहम ने बताया कि जब मैंने इन सभी पंथों का अध्ययन किया तो इस नतीजे पर पहुंची कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स) उके बाद उनके पवित्र परिजनों ने जिन शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार किया है वे सबसे उपयुक्त हैं। मैंने तर्कों के साथ उनकी शिक्षाओं कत समझा और अब मैं शिया मुसलमान हो चुकी हूं।