ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-35
जिन चीज़ों में रंग या PIGMENT पाया जाता है उन्हें रंगजनक पदार्थ कहा जाता है और जो रंग उसमें मौजूद होते हैं उनका प्रयोग विभिन्न धागों के रंगने में होता है।
ये चीज़ें या तो प्रकृति में मौजूद होती हैं या इनका निर्माण इंसान करते हैं। इस प्रकार जिन चीज़ों का प्रयोग रंग करने के लिए होता है वे दो प्रकार की होती हैं प्राकृतिक और कृत्रिम व रासायनिक जो रंग प्रकृति में मौजूद होते हैं उन्हें नेचरल रंग कहा जाता है और उनके बनाने में इंसान की कोई भूमिका नहीं होती है और प्राचीन समय से इंसान विभिन्न शैलियों द्वारा इन्हें प्राप्त करके इनका प्रयोग करता रहा है। फोनीशिया सभ्यता काल में समुद्री सीपियों को कूट और उसे उबाल कर बैग़नी रंग तैयार करते थे।
इसी प्रकार GALL NUT का प्रयोग करके काला रंग भी तैयार किया जाता था कि स्वयं GALL NUT कुछ कीड़े- मकोड़ों के एकत्रित होने का परिणाम है।
जिन चीज़ों में प्राकृतिक रंग पाये जाते हैं मात्रा की दृष्टि से वे सब समान नहीं हैं। कुछ में अधिक रंग होते हैं जबकि कुछ अन्य में कम होते हैं। जैसे बलूत, केसर और मजीठ व कालमेशी में अधिक रंग पाये जाते हैं जबकि चेनार और अंगूर के पत्तों में कम रंग होते हैं। अधिकांश प्राकृतिक अच्छे व रोचक रंग गर्म क्षेत्रों से प्राप्त किये जाते हैं।
प्राकृतिक रंगों को तीन भागों में बांटा जा सकता है। कुछ रंग ऐसे होते हैं जो मजीठ व कालमेशी जैसी वनस्पतियों से प्राप्त किये जाते हैं जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो किरिमदाना और सीपियों के अंदर पाये जाने वाले जीव- जन्तुओं से तैयार किये जाते हैं जबकि कुछ को चिकनी मिट्टी जैसे खनिजों से प्राप्त किया जाता है।
अलबत्ता रासायनिक ढंग से प्राप्त किये जाने वाले रंगों का भी प्रयोग होता है जो कृत्रिम ढंग से तैयार किया जाता है।
जो प्राकृतिक रंग होते हैं उनमें सबसे अधिक प्रयोग वनस्पतियों से प्राप्त होने वाले रंगों के होते हैं। वनस्पति से प्राप्त होने वाले प्राकृतिक रंग वनस्पति के किस भाग से प्राप्त होते हैं इस दृष्टि से भी उनके कई प्रकार हैं। जैसे कुछ रंग पुष्पों से निकाले जाते हैं जैसे RED BUD जबकि कुछ वनस्पतियां एसी हैं जिनके पत्तों से रंग निकाला जाता है जैसे चनार का पत्ता। कुछ वनस्पतियों के तनों और डालियों से भी रंग निकाला जाता है जैसे शाह बलूत। कुछ वनस्तियां एसी होती हैं जिनकी छाल से रंग निकाला जाता है जैसे रसभरी और रास्पबेरी। अलबत्ता कुछ वनस्पतियां हैं जिनके फलों से रंग निकाला जाता है जैसे SUMAC और शहतूत जबकि कुछ एसी भी वनस्पतियां हैं जिनके फलों के छिलकों से रंग निकाला जाता है जैसे प्याज़, आखरोट और अनार जबकि मजीठ और दारूहल्दी जैसी वनस्पतियों की जड़ों से रंग निकाला जाता है।
वनस्पतियों से जो रंग प्राप्त होते हैं वे स्वयं दो प्रकार के होते हैं या उनमें TANNIN या क्षार होता है या TANNIN नहीं होता है। क्षार एक पदार्थ होता है जो पत्तियों, डालियों, तनों, जड़ों और कुछ वनस्पतियों के फलों में पाया जाता है। यह पदार्थ एक विशेष प्रकार के कीड़े के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।
यह पदार्थ बलूत के घने पेड़ों पर NUTLET की भांति होता है और उसे एकत्रित करके उससे रंग निकाला जाता है। इन वनस्पतियों के पत्तों, फलों और उसके दूसरे अंशों में Oxalic acid पाया जाता है जिससे नारंजी, भूरा और काला रंग बनाया जाता है। Tanin का अधिकतर प्रयोग गहरे और हल्के रंगों में किया जाता है। इन वनस्पतियों से प्राप्त किये जाने वाले प्राकृतिक रंग से विशेषकर ऊन और कपड़े रंगे जाते हैं। इन रंगों से ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक ढंग से रंगाई की जाती है। यह जानना आपके लिए रोचक होगा कि जिन वनस्पतियों से प्राकृतिक रंग निकाले जाते हैं उनकी ईरान में व्यापक स्तर पर खेती की जा सकती है।
आज ईरान के क़ालीन उद्योग में मुख्य रूप से तीन रंग प्रयोग किये जाते हैं नीला, पीला और लाल। इनमें से जब दो रंगों को मिला देते हैं तो तीसरा रंग अपने आप बन जाता है जो बैगनी, हरा या नारंजी होता है। जब इन मुख्य तीन रंगों को आपस में एक विशेष मात्रा में मिला दिया जाता है तो कई प्रकार के रंग अस्तित्व में आ जाते हैं जैसे काला, लाल, भूरा, पीला आदि।
ऊन, रूई और रेशम की रंगाई में वनस्पति से प्राप्त होने वाले रंगों के साथ ही साथ कुछ खनिज पदार्थों का भी प्रयोग किया जाता है जैसे सोडा कास्टिक, हाईड्रो सलफेट आदि।
इन चीज़ों का प्रयोग रंग को पक्का बनाने के लिए किया जाता है। समय बीतने के साथ साथ उसकी चमक में वृद्धि हो जाती है और इसी प्रकार कुछ जीव जंतुओं से प्राप्त किये जाने वाले रंगों का भी प्रयोग किया जाता है जिनमें महत्वपूर्ण किरिमदाना है। यह एक विशेष प्रकार का कीड़ा होता है जो Coccideae की प्रजाति से होता है। यह केन्द्रीय अमरीका के गर्म क्षेत्रों और मैक्सिको में पाया जाता है। बाद में इसे योरोप और कैनरी द्वीप समूह में स्थानांतरिक किया गया। वर्तमान समय में यह मैक्सिको और कैक्ट्स की वनस्पतियों में बहुत अधिक पाया जाता है।
इसी प्रकार एक विशेष प्रकार की समुद्री सीपी भी होती है जिससे लाल रंग तैयार किया जाता है। यह सीपी अधिकतर भूमध्य सागर के तटों पर पायी जाती है और इससे जो रंग बनते हैं वे बहुत पारदर्शी और पक्के होते हैं।
क़ालीन के धागों की रंगाई दो चरणों में होती है। एक धागा कातने से पहले दूसरे इन धागों के बंडल बनाने के बाद। धागों को रंगने के लिए विभिन्न प्रकार की शैलियों और साधनों का प्रयोग होता है। इन शैलियों और साधनों के प्रयोग के कारण रंगरेज़ी की कला में निखार आता है। रंगने की शैलियों और साधनों का चयन और उससे अच्छा परिणाम प्राप्त करना, और पक्का रंग हासिल करना रंगरेज़ी के अच्छे अनुभव का सूचक है।
क़ालीन के धागों को रंगने का काम दो प्रकार से किया जाता है। एक पारंपारिक और दूसरे औद्योगिक। पारंपरिक ढंग से की जाने वाली रंगाई में रंगों को तांबे के बड़े देगों में डाला जाता है और इन देगों को आग से गर्म किया जाता है। बाद में धागों को उन देगों में डाल दिया जाता है। उसके बाद धागों को छोटे- छोटे सेंट्रीफ्यूज़ से सुखाया जाता है। इस कार्य के विभिन्न चरणों को किसी दक्ष एवं अनुभवी व्यक्ति की देखरेख में किया जाता है।
औद्योगिक ढंग से की जाने वाली रंगाई, बड़ी- बड़ी मशीनों से की जाती है। वहां पर तांबे की देगों के बजाए ब्वायलर का प्रयोग होता है। वहां पर ऊन को धागा बनाने के बाद रंगा जाता है। सबसे पहले छेदों वाली रील के चारों ओर धागों को ढीला लपेट देते हैं ताकि उन पर रंग अच्छे तरीक़े से चढ़ जाये। छेदों वाली रीलों को थोड़ी थोड़ी पर रखा जाता है ताकि वे आपस में टकराने न पाएं।
उल्लेखनीय है कि इस चरण से पहले धागों की धुलाई बहुत अच्छे ढंग से होनी चाहिए ताकि उसके भीतर पाई जाने वाली धूल – मिट्टी आदि अच्छी तरह साफ हो जाए। इसके बाद धागे के भीतर रंग बहुत अच्छी तरह और समान ढंग से पहुंच जाएगा। इन धागों को विशेष प्रकार के साबुन से धोया जाता है और रंगाई का काम धुलाई पूरी होने के बाद ही किया जाता है। जिस बरतन में ऊन को रंगा जाना है उसका तापमान 45 से 50 सेंटीग्रेड होना चाहिए। इसी तापमान में रंग को उसके मूल भण्डार में इन्जेक्ट किया जाता है। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि ऊन में प्रयोग किये जाने वाले कैमिकल रंग विशेषज्ञ उचित नहीं समझते। जैसे एसिड रंग, METALIZED रंग, सल्फर रंग आदि।
अंत में इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि ईरानी क़ालीन की एक विशेषता उसमें प्रयोग किया जाने वाला प्राकृतिक रंग है। रंगों के प्रयोग की शैली को ईरान में शताब्दियों से प्रयोग किया जा रहा है। रंगों के प्रयोग की इसी शैली ने ईरानी क़ालीनों को विश्व ख्याति प्रदान की है। साथ ही ईरान में कैमिकल रंगों का भी प्रयोग क़ालीनों में किया जाने लगा है किंतु यह बात उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक रंगों की तुलना में कैमिकल रंग, समय बीतने के साथ- साथ फीके पड़ने लगते हैं जबकि प्राकृतिक रंगों में ऐसा कुछ नहीं होता।
कालीन बुनने के उद्योग से जुड़े लोग यह बात भली-भांति जानते हैं कि प्राकृतिक रंगों का बनाया जाना कठिन होता है किंतु ईरानी क़ालीनों की विश्व ख्याति की सुरक्षा केवल इन्हीं प्राकृतिक रंगों के प्रयोग से की जा सकती है। उचित यह होगा कि ईरानी क़ालीनों में कैमिकल रंगों का प्रयोग न किया जाए। कैमिकल रंगों के प्रयोग का एक नुक़सान यह भी है कि वह पर्यावरण को दूषित करता है। पर्यावरण की सुरक्षा के दृष्टिगत उचित यह है कि ईरानी क़ालीनों को रासायनिक रंगों से दूर रखा जाए।