क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-915
सूरए ज़ुख़ुरुफ़, आयतें 1-10
आइए सबसे पहले सूरए ज़ुख़ुरुफ़ की आयत संख्या 1 से 4 तक की तिलावत सुनते हैं:
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
حم (1) وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ (2) إِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْآَنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (3) وَإِنَّهُ فِي أُمِّ الْكِتَابِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ (4)
इन आयतों का अनुवाद हैः
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है
हा-मीम,[43:1] रौशन किताब (क़ुरान) की क़सम। [43:2] हमने इस किताब को अरबी ज़बान का क़ुरान बनाया है ताकि तुम चिंतन करो। [43:3] और बेशक ये (क़ुरान) असली किताब (लौहे महफूज़) में (भी जो) मेरे पास है लिखी हुई है (और) यक़ीनन बड़े रूतबे वाली (और) हिकमत से भरी है। [43:4]
इस कार्यक्रम से हम सूरए ज़ुख़रुफ़ के बारे में अपनी चर्चा शुरू कर रहे हैं। यह क़ुरआन का 43वां सूरा है। इसमें 89 आयतें हैं। मक्के में नाज़िल होने वाले क़ुरआन के अन्य सूरों की तरह यह सूरा भी क़यामत, वजूद के स्रोत और नबूवत जैसे विषयों पर रौशनी डालता है।
क़ुरआन में सात सूरे हैं जो हा-मीम अक्षरों से शुरू हुए हैं। इनमें एक सूरए ज़ुख़रुफ़ है। इन अक्षरों के बाद क़ुरआन, उसके नाज़िल होने और इंसानों की हिदायत की बात शुरू होती है।
इस सूरे में भी मक़त्तआत कहे जाने वाले अक्षरों हा-मीम के बाद क़ुरआन की क़सम खायी गई है। इस किताब के तथ्य बहुत स्पष्ट हैं और ज़ेहन को खोल देने वाले हैं, यह इंसान को हिदायत और ख़ुशक़िस्मती का रास्ता बहुत स्पष्ट रूप में दिखाते हैं।
इस किताब में सबसे पहला ख़ेताब अरबी भाषा के लोगों से किया गया है और यह किताब अरबी भाषा में उतारी गई है। लेकिन यह किताब अरबों तक सीमित नहीं है। इसकी बातें सारे इंसानों और सोचने समझने की क्षमता रखने वाले हर व्यक्ति के लिए हैं। इस किताब को नाज़िल करने वाला अल्लाह सारे इंसानों से कहता है कि इसकी आयतों पर ग़ौर करें। इसकी महान शिक्षाओं और बातों पर ग़ौर करें और गहरी समझ और पहचान के साथ इस पर ईमान लाएं। ज़ाहिर है कि इस किताब पर ईमान लाने का मतलब यह है कि इसकी रचनात्मक और मार्गदर्शक शिक्षाओं पर अमल किया जाए।
कुछ लोग बिल्कुल ग़लत दावा करते हैं कि क़ुरआन अल्लाह की बातों नहीं पैग़म्बर मुहम्मद की बातों का संकलन है। क़ुरआन अल्लाह का कलाम है इसकी अस्ली हक़ीक़त अल्लाह के पास है। जो उम्मुल किताब या लौहे महफ़ूज़ में मौजूद है। यह किताब इलाही ज्ञान व हिकमत के आधार पर अस्तित्व में आई है। अन्य आसमानी किताबों का स्रोत भी यही है। दुनिया की सारी सच्चाइयां और इंसान की ख़ुश क़िस्मती या बदक़िस्मती के कारक इस महान किताब में बयान कर दिए गए हैं। इसमें किसी तरह की कोई हेरफेर और बदलाव संभव नहीं है।
इन आयतों से हमने सीखाः
क़ुरआन इतनी मुक़द्दस किताब है कि अल्लाह ने उसकी क़सम खायी है।
अल्लाह के रास्ते का चयन सोच विचार और मंथन के आधार पर होना चाहिए दूसरों की देखा देखी नहीं।
सारे पैग़म्बरों का संदेश और आसमानी किताबों की विषयवस्तु एक है। क्योंकि उन सब का स्रोत एक ही है।
अब आइए सूरए ज़ुख़रुफ़ की आयत संख्या 5 से 8 तक की तिलावत सुनते हैं:
أَفَنَضْرِبُ عَنْكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا أَنْ كُنْتُمْ قَوْمًا مُسْرِفِينَ (5) وَكَمْ أَرْسَلْنَا مِنْ نَبِيٍّ فِي الْأَوَّلِينَ (6) وَمَا يَأْتِيهِمْ مِنْ نَبِيٍّ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (7) فَأَهْلَكْنَا أَشَدَّ مِنْهُمْ بَطْشًا وَمَضَى مَثَلُ الْأَوَّلِينَ (8)
इन आयतों का अनुवाद हैः
भला इस वजह से कि तुम ज़्यादती करने वाले लोग हो हम तुमको नसीहत करने से मुँह मोड़ेंगे (हरगिज़ नहीं)। [43:5] और हमने अगले लोगों के बीच बहुत से पैग़म्बर भेजे थे। [43:6] और कोई पैग़म्बर उनके पास ऐसा नहीं आया जिसका इन लोगों ने उपहास न किया हो। [43:7] तो उनमें से जो ज्यादा ताक़तवर थे उनको हमने हलाक कर मारा और (दुनिया में) अगलों का कहानियां इस तरह ख़त्म हुईं। [43:8]
इतिहास में अल्लाह की एक परम्परा यह रही है कि उसने पैग़म्बरों को भेजा और आसमानी किताबें नाज़िल कीं ताकि इंसानों की हिदायत हो सके। अलबत्ता हमेशा यह भी हुआ कि लोगों और शासकों का एक वर्ग उनकी मुख़ालेफ़त में खड़ा हो गया। उनका अपमान किया गया, उनका मज़ाक़ उड़ाया गया ताकि पैग़म्बरों का व्यक्तित्व धूमिल हो जाए। कभी कभी विरोध बहुत ज़्यादा तेज़ कर दिया गया और पैग़म्बरों की शिक्षाओं के विस्तार और प्रसार को रोकने के लिए हर साधन इस्तेमाल किया गया। जंग और झड़प तक शुरू कर दी, पैग़म्बरों और उनके अनुयाइयों को क़त्ल किया गया।
इसके बावजूद अल्लाह ने कभी भी पैग़म्बरों के मिशन को टलने नहीं दिया और लोगों के इस रवैयों की वजह से उन्हें उनके हाल पर नहीं छोड़ दिया। अलबत्ता उनकी मुख़ालेफ़तों का नतीजा उनकी तबाही के रूप में निकला और उनका अंजाम दूसरों के लिए पाठ बन गया।
इन आयों से हमने सीखाः
दीनी मार्गदर्शक रुकावटें देखकर अपना फ़र्ज़ अदा करने और अपना पैग़ाम लोगों तक पहुंचाने में कोई कोताही न करें।
ईमान वाले विरोधियों के अपमान और उपहास के कारण अपने रास्ते पर आगे बढ़ने में डगमगाएं नहीं क्योंकि पैग़म्बरों का भी हमेशा कुछ नास्तिकों की तरफ़ से मज़ाक़ उड़ाया गया मगर वे महान हस्तियां अपने मार्ग पर डटी रहीं और अपने रास्ते से पीछे नहीं हटीं।
अल्लाह का अज़ाब केवल आख़ेरत तक सीमित नहीं है। बल्कि अल्लाह ने ताक़तवर क़ौमों को जो ग़लत और अति के रास्ते पर चल पड़ीं इसी दुनिया में तबाह कर दिया।
अब आइए सूरए ज़ुख़रुफ़ की आयत संख्या 9 और 10 की तिलावत सुनते हैं:
وَلَئِنْ سَأَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ الْعَزِيزُ الْعَلِيمُ (9) الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ مَهْدًا وَجَعَلَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ (10)
इन आयतों का अनुवाद हैः
और (ऐ रसूल) अगर तुम उनसे पूछो कि सारे आसमान व ज़मीन को किसने पैदा किया तो वो ज़रूर कहेंगे कि उनको ज्ञानी और शक्तिशाली (ख़ुदा ने) पैदा किया है। [43:9] जिसने तुम लोगों के वास्ते ज़मीन का फ़र्श बनाया और (फिर) उसमें तुम्हारे लिए रास्ते बनाए ताकि तुम राह मालूम करो। [43:10]
यह आयतें पैग़म्बरों की इस ज़िम्मेदारी की बात करती हैं कि वे लोगों की अस्ली प्रवृत्ति को जगाते हैं और उन्हें परवरदिगार की याद दिलाते हैं। आयत कहती है कि मुशरिक जो मूर्तियों की पूजा करते हैं अगर उनसे सवाल किया जाए कि कायनात का पैदा करने वाला कौन है तो वो भी मानेंगे कि आसमानों और ज़मीन को अल्लाह ने पैदा किया है।
अधिकतर लोग जीवन की समस्याओं में उलझे होने की वजह से इस बात से ग़ाफ़िल रहते हैं कि वजूद की शुरुआत और स्रोत कौन है और इस कायनात का अंत क्या है। वो केवल सोने जागने और आनंद उठाने की चिंता में रहते हैं। उनकी कोशिश बस यह होती है कि कुछ पैसा हासिल कर लें और अपना जीवन गुज़ारें। जबकि यह चीज़ें जीवन का अस्ली लक्ष्य नहीं है। यह चीज़ें हासिल करने के बाद इंसान संतुष्ट नहीं होता और यह नहीं मान लेता कि उसका कल्याण हो गया।
पैग़म्बर इसलिए भेजे गए कि इंसानों को झिंझोड़ें कि वे अपने अंजाम की तरफ़ से ग़ाफ़िल न हों और जीवन की भागदौड़ में अल्लाह को भूल न जाएं। वो ख़ुदा जिसने उनको भी पैदा किया और अनेक प्रकार की नेमतों उन्हें दीं। वही ख़ुदा जिसने ज़मीन को इंसानों के लिए सुकून की जगह बनाया है। हमें इस बिंदु पर ध्यान रखना चाहिए कि ज़मीन कई प्रकार की हरकत करती है लेकिन इसके बावजूद बिल्कुल शांत है और उस पर बसने वालों को कहीं कोई परेशानी नहीं हो पाती।
दूसरी नेमत यह है कि अल्लाह ने ज़मीन में इंसानों के लिए रास्ते बनाए कि वे अपना रस्ता चुने और उससे गुज़रते हुए मंज़िल तक पहुंच जाएं। पूरी धरती में पहाड़ और टीले फैले हुए हैं। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों के बीच कटाव भी है जहां से इंसान अपना रास्ता बना सकता है। यह सब भी अल्लाह की नेमतें है।।
तो केवल वही ख़ुदा जिसने यह नेमतों इंसान को दी हैं और उनका पैदा करने वाला है वही इबादत के लायक़ है। दर हक़ीक़त इंसान इबादत के ज़रिए दुनिया की नेमतों से फ़ायदा भी उठा सकता है और आख़ेरत में बहिश्त में जगह हासिल कर सकता है।
इन आयतों से हमने सीखाः
अल्लाह की पहचान और उसकी तरफ़ रुजहान प्राकृतिक और स्वाभाविक चीज़ है लेकिन ज़रूरत पड़ती है कि इंसान को ग़फ़लत से जगाया जाए।
जीवन में अल्लाह की नेमतों की तरफ़ तवज्जो ग़फ़लत दूर करने का सबसे अच्छा ज़रिया है।
ख़ुदा ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है और इंसानों की ज़रूरत के साधन ज़मीन में रखे हैं, इंसानों की हिदायत के कारक भी मुहैया करा दिए हैं ताकि इंसान दुनिया और आख़ेरत में सफल हो जाए।