Apr २९, २०१९ १४:३१ Asia/Kolkata

हर समाज में बच्चे पाए जाते हैं और शारीरिक स्वास्थ्य और विशेष स्थिति से भी संपन्न होने के बावजूद भी सामान्य जीवन व्यतीत नहीं करते।

इसके दो कारण हो सकते हैं जिनसे इन बच्चों को इन हालात का सामना करना पड़ रहा है। पहला कारण यह हो सकता है कि बच्चा, अवैध संबंध से पैदा हुआ है या अनचाहा बच्चा हो। इस हालत में सामान्य रूप से कोई भी पुरुष या महिला, इस बच्चे को जन्म देने और दुनिया में लाने में रुचि नहीं रखता और यह प्रयास करता है कि इस बच्चे को गिरा दिया जाए और यदि बच्चा पैदा भी हो जाता है तो उसकी रक्षा में अधिक ध्यान नहीं देते और उसे कूड़ेदान या सार्वजनिक स्थल पर छोड़ देते हैं। इस प्रकार के बच्चे को रास्ते में पाया गया बच्चा कहा जाता है ताकि जो भी देखे उसे उठा ले और अपने साथ ले जाए। कभी कभी हो सकता है कि बच्चा मां बाप की वैध संतान हो और उनका क़ानूनी बच्चा हो किन्तु निर्धनता और ग़रीबी की वजह से वह बच्चे का पालन पोषण करने में अक्षम होते हैं जिसके बाद वह मजबूर होकर बच्चे को किसी सार्वजनिक स्थल पर छोड़ देते हैं ताकि कोई निसंतान या बाल बच्चेदार आदमी उसे उठा ले और कम से कम दो समय की रोटी तो उसे नसीब हो जाए।

यहां पर महत्वपूर्ण बिन्दु है जिसका सभी को ध्यान रखना आवश्यक है और वह यह है कि इस प्रकार के बच्चों को भी उचित संभावनाएं दी जानी चाहिए ताकि वे आवश्यक रूप से विकास कर सके और अपने योग्य स्थान तक पहुंच सके।

दूसरा कारण माता पिता की मौत, बाढ़, तूफ़ान, भूकंप या युद्ध जैसी आपदाएं हो सकती हैं जिन से उस बच्चे के सिर के माता पिता का साया उठ जाता है और बच्चा इस दुनिया में अकेला हो जाता है। जिन दो गुटों का हमने वर्णन किया है उनके अलावा दो और गुटों पर भी ध्यान किए जाने की आवश्यकता है, इनमें पहला उन बच्चे का हैं जो अनेक कारणों से घर से भाग जाते हैं और फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के साथ रहने लगते हैं और उन्हीं की तरह जीवन व्यतीत करने लगते हैं। दूसरा गुट लेबर या मज़दूर बच्चों का है जो घर के हालात सही न होने की वजह से काम करने पर मजबूत हो जाते हैं ताकि इस प्रकार घर का ख़र्चा चला सकें और अपने घरवालों और परिजनों की मदद कर सकें। लेबर बच्चों के बारे में इससे पहले के कार्यक्रम में हमने चर्चा की थी और अब आज घर से भागने वाले बच्चों के विषय पर विशेषकर वह बच्चे जिनके अभिभावक बुरे होते हैं उनके विषय पर हम चर्चा करेंगे।

 

सबसे पहले हम अनाथ या बिना अभिभावक वाले बच्चे की स्थिति पर चर्चा करेंगे। धार्मिक शिक्षाओं और धर्म शास्त्र की किताबों में अनाथ या बिना अभिभावक वाले बच्चों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। यद्यपि इस्लामी क़ानून में मुंहबोले, पाले हुए या दतक पुत्र के हवाले से कोई ख़ास बात नहीं है किन्तु इस विषय पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है कि इस प्रकार के बच्चों का ध्यान रखने के लिए ख़ास नियम बनाए गये हैं। इस प्रकार के बच्चों के अभिभावकों और उनकी रक्षा के लिए धर्म शास्त्र में तीन प्रकार के दृष्टिकोण पेश किए गये हैं जिनकी ओर हम बाद में केवल इशारा करेंगे।

कुछ धर्मशास्त्रियों ने कुछ दलीलों का सहारा लेकर सदक्रम करने के अंतर्गत भला काम करने की आवश्यकता, लोगों को ज़िंदा रखने की अनिवार्यता और ग़रीब व लाचार लोगों को खाना खिलाने की अनिवार्यता को दृष्टिगत रखते हुए इस प्रकार के बच्चों के समर्थन और उनकी अभिभावकता को अनिवार्य क़रार दिया है किन्तु यह अनिवार्यता ऐसी है जब समाज का कोई व्यक्ति यह काम अंजाम दे दे तो दूसरे पर इसकी अनिवार्यता समाप्त हो जाती है, इसे धर्मशास्त्र में वाजिबे किफ़ाई कहा जाता है। इसके मुक़ाबले में दूसरे धर्मशास्त्री भले काम करने और इस प्रकार के काम में सहयोग को पुण्य का काम समझते हैं जबकि तीसरा गुट अनिवार्यता और पुण्य के बीच की बात स्वीकार करता है। पवित्र क़ुरआन में भले काम करने की बहुत अधिक सिफ़ारिश की गयी है। कभी भले काम करने को अनिवार्य क़रार दिया गया है और कभी इसको पुण्य का काम क़रार दिया गया है। अलबत्ता यहां पर बताना आवश्यक है कि इस प्रकार के बच्चों की रक्षा और उनको सुरक्षित रखने में जो विशेष स्थिति से संपन्न हैं, धर्म की अनुमति आवश्यक होती है।

 

वर्तमान युग में और 21वीं शताब्दी के आरंभ में बिना अभिभावक के बच्चों के समर्थन का मुद्दा, जनमत के दबाव के कारण जो बहुत से अनाथ और बिना अभिभावक वाले बच्चों से प्रभावित होकर बना, युद्ध के अवसर पर इस प्रकार के बच्चों की संख्या बढ़ गयी थी और उनकी रक्षा की आवश्यकता का एहसास होने लगा। यही कारण है कि बहुत से देशों ने ऐसे क़ानून बनाए ताकि इस प्रकार के बच्चों की रक्षा और उनका समर्थन किया जा सके और उनको उनकी क्षमता के अनुसार शिखर तक पहुंचाया जाए और उनके पास अधिक से अधिक संभावनाएं क़रार दी जाए। बच्चों के कन्वेन्शन की धारा 20 में बताया गया है कि बच्चे, स्थाई रूप से या अस्थाई रूप से पारिवारिक वातावरण से और अपने हित से दूर नहीं होना चाहिए और उन्हें सरकार की ओर से समर्थन मिलना चाहिए और उनका ध्यान रखना चाहिए और उनकी मदद की जानी चाहिए।

कन्वेन्शन के समर्थक देशों को चाहिए कि वह अपने राष्ट्रीय नियमों के अनुसार, इस प्रकार के बच्चों का ध्यान रखने के लिए वैकल्पिक रास्ता चुनना चाहिए। इस प्रकार के वैकल्पिक रास्ते और ध्यान रखने में कुछ चीज़े शामिल हैं। इस्लामी क़ानूनों में अभिभावक और कफ़ील का निर्धारण, बच्चा गोद लेना या आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को बच्चा केन्द्र भेजना, बच्चों के प्रशिक्षण, उसके धर्म, जाति, संस्कृति और भाषा पर विशेष ध्यान दिया जाना शामिल है।

 

आइये अब हम बुरे अभिभावक वाले बच्चों के विषय पर चर्चा करते हैं। बुरे अभिभावक से हमारा तात्पर्य वह बच्चे हैं जिनके अभिभाव तो हैं किन्तु वह विभिन्न आयामों से उनका ध्यान रखने में असमर्थ हैं या विभिन्न प्रकार से बच्चों के लिए समस्या का कारण बन जाते हैं और बच्चों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं। सामाजिक दृष्टि से इस प्रकार के बच्चों को सामाजिक अनाथ कहा जाता है। आज विश्व स्तर पर परिवार में बच्चों के विरुद्ध यौन उत्पीड़न, मानसिक और शारीरिक हिंसा की समस्या समाज के लिए एक चुनौती बन गयी है जिससे निपटना सब पर अनिवार्य है।

संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र जांच रिपोर्ट के 47वें अनुच्छेद में जिसमें बच्चों के विरुद्ध हिंसा के बारे में चर्चा की गयी है, में कहा गया है कि एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष औसतन 13 लाख 3 हज़ार से 37 लाख पांच हज़ार बच्चे दुनिया में घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं। घर में बच्चे निरंतर हिंसा का शिकार होते रहते हैं, यह इस प्रकार होता है कि घर में मौजूद बच्चा अपने माता पिता या मां को अपने लाइफ़ मार्टनर के साथ झगड़ा करते हुए देखता है जिससे बच्चे के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उसका सामाजिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। इसी प्रकार जीवनसाथी के संबंध में हिंसा, बच्चों के विरुद्ध हिंसा के ख़तरे को बढ़ा देता है। चीन, कोलंबिया, मैक्सिको, फ़िलीपीन और दक्षिणी अफ़्रीक़ा में होने वाले शोधों से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और बच्चों के विरुद्ध हिंसा में गहरे संबंध का पता चलता है। भारत में होने वाले एक शोध के अनुसार घरेलू हिंसा से बच्चों के विरुद्ध हिंसा का स्तर दुगुना बढ़ जाता है।

बुरे अभिभावक और अनाथ बच्चों की समीक्षा करने से पता चलता है कि इन बच्चों में आम बच्चों की तुलना में अवसाद 40 प्रतिशत अधिक होता है। वह बच्चे जो 24 घंटे के निगरानी केन्द्रों में पले बढ़े होते हैं वह दूसरों से अपना प्रेम ज़ाहिर करने के लिए स्वाभाविक अवसरों और यहां तक कि अपना प्रेम ज़ाहिर करने से भी वंचित होते हैं। ऐसे युवा बच्चों में निराशा का स्तर, आम युवा बच्चों की तुलना में बहुत अधिक होता है। ऐसे बच्चे जो परिवार से दूर पले बढ़े होते हैं दूसरे बच्चों की तुलना में अधिक अवज्ञाकारी होते हैं।

इस संबंध में बच्चों का सरकारी गतिविधियों और समाजिक कार्यवाहियों द्वारा समर्थन महत्वपूर्ण है। अलबत्ता यह बात महत्वपूर्ण है कि बच्चों के समर्थन और विकास के लिए सबसे अच्छी जगह परिववार है और इस पर विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कन्वनेश्न और समझौते बल देते रहे हैं। (AK)

 

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